सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण में यह साबित हो जाता है कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उससे बच्चे के भरण-पोषण की मांग नहीं की जा सकती। शीर्ष अदालत का यह फैसला पारिवारिक विवादों और भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर केवल अनुमान या सामाजिक संबंधों के आधार पर आर्थिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, खासकर तब जब वैज्ञानिक साक्ष्य इसके विपरीत हों। अदालत ने कहा कि डीएनए परीक्षण एक विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण है और यदि रिपोर्ट में स्पष्ट हो जाए कि संबंधित व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसके खिलाफ भरण-पोषण का आदेश देना न्यायसंगत नहीं होगा। यह मामला एक ऐसे विवाद से जुड़ा था जिसमें महिला ने अपने पति या पूर्व पति से बच्चे के भरण-पोषण की मांग की थी, जबकि डीएनए रिपोर्ट में यह साबित हुआ कि वह व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है। सुप्रीम Court ने निचली अदालतों के आदेशों की समीक्षा करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि किसी निर्दोष व्यक्ति पर अनुचित आर्थिक बोझ डालना। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय होगा और विवाह, वैधानिक पितृत्व तथा अन्य कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखा जाएगा। इस फैसले को पुरुषों के अधिकारों और पारिवारिक कानूनों में वैज्ञानिक साक्ष्यों की बढ़ती भूमिका के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में ऐसे मामलों में डीएनए परीक्षण को अधिक महत्व मिलेगा और अदालतें तथ्यों के आधार पर अधिक स्पष्ट निर्णय ले सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला परिवार कानून, भरण-पोषण विवाद और पितृत्व से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दिशा तय करता है।
by Dainikshamtak on | 2026-04-23 10:38:06