जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में 22 फरवरी 2026 को सुरक्षा बलों ने एक लंबे और चुनौतीपूर्ण अभियान का निर्णायक चरण पूरा करते हुए तीन विदेशी आतंकियों को मार गिराया। यह कार्रवाई बहुचर्चित ऑपरेशन त्राशी-I का हिस्सा थी, जिसे सुरक्षाबलों ने लगभग एक महीने से अधिक समय तक बर्फीले और दुर्गम इलाकों में लगातार चलाया। चत्रू वन क्षेत्र के पासरकूट इलाके में हुई इस मुठभेड़ को सुरक्षा एजेंसियां चिनाब घाटी में स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रही हैं।अंतिम मुठभेड़ एक पहाड़ी की तलहटी में बने एक कच्चे ढांचे, जिसे स्थानीय भाषा में ‘ढोक’ कहा जाता है, में हुई। खुफिया सूचना के आधार पर सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने संयुक्त घेराबंदी की। करीब छह घंटे चली भीषण गोलीबारी के बाद तीनों आतंकी ढेर कर दिए गए। मारे गए आतंकियों में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन *Jaish-e-Mohammad* का स्वयंभू शीर्ष कमांडर सैफुल्लाह भी शामिल था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार वह पिछले लगभग पांच वर्षों से चिनाब घाटी में सक्रिय था और कई बड़े हमलों की साजिश में शामिल रहा था।सैफुल्लाह पर 10 से 20 लाख रुपये तक का इनाम घोषित था और वह पहले भी छह से अधिक मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों को चकमा देकर फरार हो चुका था। जुलाई 2024 में हुए एक हमले, जिसमें चार जवान शहीद हुए थे, का मास्टरमाइंड भी उसे ही माना जाता है। उसके साथ मारे गए दो अन्य आतंकी भी विदेशी नागरिक बताए जा रहे हैं, जिनकी पहचान औपचारिक प्रक्रिया के तहत की जा रही है। मुठभेड़ के दौरान ठिकाने में आग लग जाने से शव आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे पहचान में समय लग रहा है।ऑपरेशन त्राशी-I की शुरुआत 18 जनवरी 2026 को सोनार जंगल क्षेत्र में हुई एक मुठभेड़ के बाद की गई थी। उस शुरुआती भिड़ंत में 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज का एक जवान शहीद हुआ था और कई अन्य घायल हुए थे। इसके बाद सुरक्षाबलों ने व्यापक स्तर पर तलाशी और घेराबंदी अभियान शुरू किया। दो फीट से अधिक बर्फ, घने जंगल और शून्य से नीचे तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अभियान लगातार जारी रखा गया। जनवरी और फरवरी के दौरान सुरक्षाबलों का आतंकियों से कई बार संपर्क हुआ, क्योंकि वे डोलगाम, दिछार और चत्रू के बीच लगातार स्थान बदलते रहे।इस अभियान में सेना की *Rashtriya Rifles* की 11 आरआर इकाई, जम्मू-कश्मीर पुलिस और *Central Reserve Police Force* ने समन्वित भूमिका निभाई। आधुनिक तकनीक का भी व्यापक उपयोग किया गया, जिसमें एफपीवी ड्रोन, थर्मल इमेजिंग और सैटेलाइट तस्वीरों की मदद ली गई। अधिकारियों के अनुसार यह केवल 36 दिन का अभियान नहीं था, बल्कि इस विशेष आतंकी मॉड्यूल का पीछा पिछले 326 दिनों से किया जा रहा था। सुरक्षाबलों ने ‘सैचुरेशन’ रणनीति अपनाई, जिसके तहत जवानों को हर 48 घंटे में रोटेट किया गया ताकि वे कठिन मौसम में भी पूरी क्षमता के साथ डटे रह सकें, जबकि आतंकी थकान और संसाधनों की कमी से जूझते रहे।मुठभेड़ स्थल से बरामद हथियारों और सामग्री ने भी इस मॉड्यूल की गंभीरता को उजागर किया। सैफुल्लाह के पास से एक अमेरिकी निर्मित एम4 कार्बाइन मिली, जो आमतौर पर उच्च प्रशिक्षित और शीर्ष कमांडरों द्वारा इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा दो से तीन एके-47 राइफलें, बड़ी मात्रा में गोलाबारूद, मैगजीन, संचार उपकरण, मोबाइल फोन, सैटेलाइट मैप और बर्फीले इलाकों में लंबे समय तक छिपे रहने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सर्वाइवल किट बरामद किए गए। अधिकारियों का कहना है कि यह बरामदगी संकेत देती है कि आतंकी लंबे समय तक इलाके में सक्रिय रहने और हमलों की योजना बनाने की तैयारी में थे।इस अंतिम चरण में एक विशेष उल्लेखनीय भूमिका सेना के प्रशिक्षित हमलावर कुत्ते टायसन ने निभाई। 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज से जुड़े टायसन को सबसे पहले संदिग्ध ठिकाने की ओर भेजा गया। उसने आतंकियों की सटीक लोकेशन चिन्हित की और अंदर घुसते ही पहली गोली झेली। घायल होने के बावजूद उसने पीछे हटने के बजाय आतंकियों को फायरिंग के लिए मजबूर किया, जिससे सुरक्षाबलों को उनकी सही स्थिति का अंदाजा लगा और वे सटीक जवाबी कार्रवाई कर सके। मुठभेड़ के बाद टायसन को तुरंत हेलिकॉप्टर से चिकित्सीय सहायता के लिए ले जाया गया। सेना की *White Knight Corps* ने जानकारी दी कि वह स्थिर है और तेजी से स्वस्थ हो रहा है।स्थानीय अधिकारियों के अनुसार यह मॉड्यूल ‘अजराइल ग्रुप’ के नाम से जाना जाता था, जिसे उसकी घातक क्षमताओं के कारण यह उपनाम दिया गया था। सुरक्षाबलों का दावा है कि पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में घुसपैठ करने वाले सातों विदेशी आतंकियों को अब समाप्त कर दिया गया है। इसे चिनाब घाटी में सक्रिय एक बड़े नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।रणनीतिक दृष्टि से यह सफलता केवल तीन आतंकियों के मारे जाने तक सीमित नहीं है। यह उस दीर्घकालिक और सतत रणनीति का परिणाम है, जिसमें मानव खुफिया, तकनीकी निगरानी और जमीनी कार्रवाई का समन्वय किया गया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लगातार दबाव बनाए रखने की नीति ने आतंकियों को सीमित क्षेत्र में समेट दिया और अंततः उन्हें सुरक्षित ठिकाना नहीं मिल सका। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के अभियान न केवल तत्काल खतरे को समाप्त करते हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर आतंकी संरचनाओं के मनोबल को भी तोड़ते हैं।हालांकि मुख्य मुठभेड़ समाप्त हो चुकी है, लेकिन आसपास के जंगलों में तलाशी और घेराबंदी अभियान जारी है ताकि किसी भी संभावित सहयोगी या छिपे हुए सदस्य को पकड़ा जा सके। सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं और क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है। कुल मिलाकर, ऑपरेशन त्राशी-I का यह चरण जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ चल रही व्यापक रणनीति का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है, जिसने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षा बल अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
by Dainikshamtak on | 2026-02-24 18:39:35