राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवाओं, परिवार और समाज में संवाद की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान समय अंधानुकरण का नहीं बल्कि विचार-विमर्श और तर्कपूर्ण संवाद का है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी हर विषय पर प्रश्न पूछती है और यह स्वाभाविक है। इसलिए उन्हें आदेश देने के बजाय धैर्यपूर्वक, प्रेमपूर्वक और तर्क के साथ समझाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार समाज और परिवार दोनों में संवाद की परंपरा को मजबूत करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। मोहन भागवत ने कहा कि विचारों को थोपने की संस्कृति के स्थान पर चर्चा और संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी विश्वास और समझ के साथ निर्णय ले सके। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है, लेकिन आज के समय में परिवारों के भीतर भी बातचीत कम होती जा रही है, जो चिंता का विषय है। उनका मानना है कि यदि परिवारों में नियमित संवाद बना रहे तो पीढ़ियों के बीच बेहतर समझ विकसित होगी और सामाजिक मूल्यों को आगे बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश में युवाओं के दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है तथा उनके प्रश्नों को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार संवाद ही विश्वास का आधार बनता है और किसी भी स्वस्थ समाज के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मोहन भागवत का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब शिक्षा, समाज, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा हो रही है। सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के साथ खुले संवाद, पारस्परिक सम्मान और तार्किक चर्चा पर दिया गया यह संदेश परिवारों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। उन्होंने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए संवाद, सहभागिता और पारस्परिक समझ को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
by Dainikshamtak on | 2026-07-26 23:30:06