भारत के अधिकांश शहरों की तरह भोपाल में भी फुटपाथ बने तो हैं, लेकिन उन पर चलना हमेशा आसान नहीं होता। कहीं दुकानों का सामान रास्ता घेर लेता है, कहीं ठेले लग जाते हैं, तो कहीं दोपहिया वाहन ही फुटपाथ को पार्किंग बना देते हैं। ऐसे में पैदल चलने वाले लोगों को मजबूर होकर सड़क पर उतरना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
इसी बीच बेंगलुरु ने एक ऐसा अभियान शुरू किया है, जिसने शहरी प्रबंधन को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। *ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA)* ने *'सेफ फुटपाथ कैंपेन'* के तहत केवल तीन दिनों में *200 किलोमीटर से अधिक फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त* कर दिया। यह सिर्फ एक एंटी-एनक्रोचमेंट ड्राइव नहीं थी, बल्कि शहर को अधिक पैदल-हितैषी बनाने की दिशा में एक संगठित प्रयास था।
अब सवाल यह है कि *क्या भोपाल भी ऐसा कर सकता है?*
सच यह है कि भोपाल में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नई बात नहीं है। नगर निगम समय-समय पर *न्यू मार्केट, एमपी नगर, जुमेराती, चौक, बैरागढ़ और करोंद* जैसे इलाकों में अभियान चलाता है। शुरुआती दिनों में फुटपाथ साफ़ भी दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद वही दुकानें, ठेले और अवैध पार्किंग दोबारा लौट आते हैं।
यहीं पर भोपाल और बेंगलुरु के मॉडल में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।
भोपाल की अधिकांश कार्रवाई *"क्लियरेंस ड्राइव"* तक सीमित रहती है, जबकि बेंगलुरु अब *स्थायी फुटपाथ नीति (Footpath Policy)* बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, ताकि एक बार हटाया गया अतिक्रमण दोबारा वापस न आए।
दरअसल, भोपाल की समस्या सिर्फ अतिक्रमण तक सीमित नहीं है। शहर के कई हिस्सों में फुटपाथों की डिज़ाइन ही पैदल यात्रियों के अनुकूल नहीं है। कहीं फुटपाथ बीच में ही खत्म हो जाते हैं, कहीं बिजली के खंभे या ट्रांसफॉर्मर रास्ता रोक लेते हैं, तो कई जगह फुटपाथ इतने संकरे हैं कि दो लोग साथ चल भी नहीं सकते। कई इलाकों में फुटपाथ टूटे हुए हैं या उनकी ऊँचाई इतनी असमान है कि बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों के लिए उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि *फुटपाथ पर कौन खड़ा है, बल्कि यह भी है कि **फुटपाथ बना कैसे है।*
शहरी नियोजन से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भोपाल को वास्तव में एक *वॉकेबल सिटी* बनाना है, तो केवल बुलडोज़र चलाने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए एक दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता होगी।
सबसे पहले शहर के प्रमुख मार्गों पर *नो-वेंडिंग ज़ोन* स्पष्ट रूप से तय करने होंगे, ताकि पैदल यात्रियों के लिए लगातार और सुरक्षित रास्ता उपलब्ध रहे। इसके साथ ही स्ट्रीट वेंडर्स के लिए वैकल्पिक स्थान विकसित करने होंगे, जिससे उनकी आजीविका भी प्रभावित न हो और फुटपाथ भी खाली रहें।
दूसरी बड़ी चुनौती *पार्किंग प्रबंधन* की है। भोपाल के व्यस्त बाज़ारों में अक्सर कार और दोपहिया वाहन फुटपाथों पर ही खड़े मिलते हैं। जब तक पार्किंग व्यवस्था बेहतर नहीं होगी, तब तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का असर सीमित ही रहेगा।
इसके अलावा शहर में फुटपाथों की नियमित निगरानी भी जरूरी है। कई विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि नगर निगम डिजिटल मॉनिटरिंग, नागरिक शिकायत प्रणाली और नियमित निरीक्षण जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करे, ताकि दोबारा अतिक्रमण होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है *शहरी डिज़ाइन*। फुटपाथ केवल सीमेंट का रास्ता नहीं होते। उनमें पर्याप्त चौड़ाई, सुरक्षित ज़ेब्रा क्रॉसिंग, रैंप, स्ट्रीट लाइटिंग और निरंतरता जैसी सुविधाएँ भी होनी चाहिए। अगर पैदल चलना सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं होगा, तो लोग स्वाभाविक रूप से सड़क पर चलेंगे और दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ेगा।
भोपाल के लिए यह समय केवल अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि *पैदल यात्रियों को शहर के केंद्र में रखने* का है। जैसे-जैसे शहर का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे ऐसी नीतियों की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है जो सड़कों को सिर्फ वाहनों के लिए नहीं, बल्कि लोगों के लिए भी सुरक्षित बनाएं।
बेंगलुरु का अभियान यह दिखाता है कि इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीति के साथ फुटपाथों को दोबारा लोगों के लिए वापस लाया जा सकता है। अब सवाल यह है कि क्या भोपाल भी अस्थायी कार्रवाई से आगे बढ़कर ऐसी स्थायी व्यवस्था बना पाएगा, जहाँ फुटपाथ वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए हों—न कि दुकानों, वाहनों या अतिक्रमण के लिए।
क्योंकि किसी भी आधुनिक शहर की पहचान सिर्फ चौड़ी सड़कों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि *वहाँ पैदल चलना कितना सुरक्षित और आसान है।
by Dainikshamtak on | 2026-07-09 16:02:47