मुंबई में हर वर्ष मानसून के दौरान होने वाले जलभराव को लेकर सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों को केवल बृहन्मुंबई महानगरपालिका को ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए। अदालत ने कहा कि शहर में जलभराव की समस्या केवल प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि अतिक्रमण, नालों में कचरा जमा होने, जल निकासी तंत्र में बाधा तथा सार्वजनिक अवसंरचना के अनुचित उपयोग जैसी कई अन्य वजहें भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। न्यायालय ने कहा कि यदि नालों पर अतिक्रमण किया जाएगा, उनमें कचरा डाला जाएगा और जल निकासी मार्ग बाधित किए जाएंगे, तो भारी वर्षा के दौरान जलभराव की समस्या स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होगी। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि शहर के विकास और नागरिक सुविधाओं को प्रभावी बनाए रखने के लिए प्रशासन और नागरिकों दोनों की समान जिम्मेदारी है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों से मानसून के दौरान जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने, नालों की नियमित सफाई सुनिश्चित करने तथा अतिक्रमण हटाने के लिए प्रभावी कदम उठाने को कहा। साथ ही नागरिकों से भी सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न फेंकने और नगर निकाय के साथ सहयोग करने की अपेक्षा जताई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि मुंबई जैसे अत्यधिक घनी आबादी वाले महानगर में जलभराव की समस्या का समाधान केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए शहरी नियोजन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, नालों के संरक्षण और नागरिक सहभागिता की भी आवश्यकता है। पिछले कुछ वर्षों में मुंबई में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जिससे जल निकासी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। ऐसे में न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासनिक जवाबदेही के साथ-साथ नागरिक जिम्मेदारी पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित करती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नगर प्रशासन और नागरिक मिलकर जलभराव जैसी चुनौती से निपटने के लिए किस प्रकार दीर्घकालिक और प्रभावी समाधान लागू करते हैं।
by Dainikshamtak on | 2026-07-09 11:33:16