राज्यसभा में एक निजी सदस्य विधेयक (Private Member's Bill) पेश किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय पुरुष आयोग (National Commission for Men) की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है। विधेयक पेश करते हुए सांसद ने कहा कि समाज में पुरुष भी विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, झूठे मामलों और मानसिक प्रताड़ना के शिकार हो सकते हैं, इसलिए उनकी शिकायतों के समाधान के लिए एक समर्पित वैधानिक संस्था की आवश्यकता है। यह पहल हाल ही में चर्चा में आए सिया-केतन मामले के बाद सामने आई है, जिसने पुरुष अधिकारों और लैंगिक न्याय पर नई बहस को जन्म दिया है। प्रस्तावित आयोग का उद्देश्य पुरुषों से संबंधित शिकायतों की सुनवाई, नीतिगत सुझाव देना, जागरूकता बढ़ाना और सरकार को आवश्यक सिफारिशें प्रस्तुत करना बताया गया है। समर्थकों का तर्क है कि जिस प्रकार महिलाओं, बच्चों और अन्य वर्गों के लिए अलग-अलग आयोग कार्यरत हैं, उसी प्रकार पुरुषों की समस्याओं के समाधान के लिए भी एक संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी ओर, कुछ सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नए आयोग के गठन से पहले उसके दायरे, अधिकारों और मौजूदा कानूनी ढांचे पर व्यापक चर्चा आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि लैंगिक न्याय का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान संरक्षण प्रदान करना होना चाहिए। संसदीय प्रक्रिया के अनुसार निजी सदस्य विधेयक का कानून बनना अनिवार्य नहीं होता। ऐसे विधेयकों पर सदन में चर्चा होती है और उन्हें पारित करने के लिए दोनों सदनों की मंजूरी तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है। फिलहाल यह विधेयक संसद में विचार के लिए प्रस्तुत किया गया है। आने वाले दिनों में इस प्रस्ताव पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच व्यापक चर्चा होने की संभावना है। यह बहस भारत में लैंगिक न्याय, समान अधिकारों और संस्थागत सुधारों से जुड़े विमर्श को नई दिशा दे सकती है।
by Dainikshamtak on | 2026-07-06 13:55:14