28 अप्रैल 2026 को संयुक्त अरब अमीरात ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया। UAE ने आधिकारिक तौर पर OPEC और OPEC Plus दोनों से अलग होने का ऐलान किया। यह फैसला 1 मई 2026 से लागू हुआ। यह महज एक देश का किसी संगठन से बाहर निकलना नहीं है। यह उस पुरानी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है जिसने दशकों तक दुनिया के तेल बाजार को नियंत्रित किया।OPEC यानी Organization of the Petroleum Exporting Countries की स्थापना 1960 में हुई थी। इसका मकसद था कि तेल उत्पादक देश मिलकर उत्पादन तय करें और कीमतों पर नियंत्रण रखें। बाद में रूस जैसे देशों को मिलाकर OPEC Plus बना। UAE इस संगठन का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश था। उसके जाने से संगठन अपने कुल उत्पादन का लगभग 12 प्रतिशत खो देगा। यह कोई छोटा नुकसान नहीं है।UAE के इस फैसले के पीछे कई वजहें हैं जो सालों से धीरे धीरे पकती रही थीं। सबसे बड़ी वजह उत्पादन कोटे को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद है। UAE ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा दिया है। लेकिन OPEC के कोटा सिस्टम में उसे सिर्फ 32 लाख बैरल प्रतिदिन तक सीमित रहना पड़ता था। जब आपके पास क्षमता हो और बाजार में मांग भी हो, लेकिन एक बाहरी नियम आपको रोके, तो यह सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान है। UAE के लिए यह कोटा सिस्टम अपना ही पैसा छोड़ने जैसा था।दूसरी बड़ी वजह UAE और सऊदी अरब के बीच बिगड़ते रिश्ते हैं। यह दोनों देश एक समय खाड़ी क्षेत्र में करीबी सहयोगी माने जाते थे। लेकिन यमन संघर्ष ने इस रिश्ते में गहरी दरार डाल दी। यमन के गृहयुद्ध में UAE ने अलगाववादी ताकतों का समर्थन किया जबकि सऊदी अरब उनके विरोधियों के साथ था। यह तनाव इतना बढ़ा कि 2025 के अंत में सऊदी सेना ने UAE के सहयोगियों पर हवाई हमले तक किए। जब दो देशों के बीच संबंध इस हद तक बिगड़ जाएं तो एक ही संगठन में बने रहना और मिलकर फैसले लेना लगभग असंभव हो जाता है।तीसरी वजह आर्थिक और रणनीतिक है। UAE अब सिर्फ तेल पर निर्भर नहीं रहना चाहता। अबू धाबी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नवीकरणीय ऊर्जा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। इसके लिए उसे अधिकतम राजस्व और पूरी आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए। OPEC की सदस्यता इस स्वतंत्रता को सीमित करती थी। उसके ऊपर एक और बड़ा आर्थिक तथ्य है। दुनिया में तेल की मांग अपनी अधिकतम सीमा के करीब पहुंच रही है। इलेक्ट्रिक वाहन बढ़ रहे हैं, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार हो रहा है। ऐसे में जिन देशों के पास कम लागत में तेल निकालने की क्षमता है, उनके लिए समझदारी यही है कि जितना जल्दी हो सके उतना तेल बेच लें। कोटा सिस्टम में बैठकर इंतजार करना उनके लिए घाटे का सौदा है।चौथा और शायद सबसे तात्कालिक कारण क्षेत्रीय युद्ध का संदर्भ है। अमेरिका और इजराइल के ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खतरे में डाल दिया है। यह वह संकरा समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल प्राप्त करता है। इस रास्ते पर हमले और खतरे ने पूरे ऊर्जा बाजार में भारी उथलपुथल मचा दी है। ऐसे संकट के समय UAE को लगा कि उसे अपने फैसले खुद लेने की जरूरत है, किसी कार्टेल के निर्देशों पर निर्भर रहने की नहीं।अब सवाल यह है कि UAE के जाने से दुनिया के तेल बाजार पर क्या असर पड़ेगा। OPEC के पास अब सामूहिक उत्पादन कटौती के जरिए कीमतें नियंत्रित करने की पहले जैसी ताकत नहीं रहेगी। एक छोटा OPEC कम प्रभावशाली OPEC है। UAE अगर अपना उत्पादन बढ़ाता है तो आने वाले समय में तेल की कीमतें नीचे आ सकती हैं। यह उन देशों के लिए अच्छी खबर है जो तेल आयात करते हैं, जैसे भारत। लेकिन फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की वजह से UAE अपना अतिरिक्त तेल बाहर नहीं भेज सकता। इसलिए कीमतों पर इस फैसले का असर तब तक सीमित रहेगा जब तक यह समुद्री रास्ता दोबारा नहीं खुलता।यह पहली बार नहीं है कि किसी देश ने OPEC को अलविदा कहा हो। कतर 2019 में संगठन छोड़ चुका है। अंगोला 2024 में गया। और अब 2026 में UAE। यह एक पैटर्न है जो बता रहा है कि राष्ट्रीय हित अब सामूहिक समझौतों पर भारी पड़ रहे हैं। नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था में हर देश अपनी शर्तों पर खेलना चाहता है।UAE का यह फैसला एक संकेत है कि पुरानी ऊर्जा व्यवस्था बदल रही है। जो संगठन कभी दुनिया के तेल बाजार का सबसे ताकतवर खिलाड़ी था, वह धीरे धीरे कमजोर पड़ रहा है। अगला सवाल यह नहीं है कि OPEC इस झटके से उबर पाएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या OPEC की इस नई दुनिया में कोई प्रासंगिकता बचती है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-03 19:58:09