क्या हम इंसानों से दूर और AI के करीब होते जा रहे हैं?

क्या हम इंसानों से दूर और AI के करीब होते जा रहे हैं?

रात के 2 बज रहे हैं। एक युवा अपने कमरे में बैठा है, नींद गायब है, दिमाग में विचारों का तूफान है, दिल भारी है। फोन उठाता है, लेकिन किसी दोस्त को कॉल नहीं करता। परिवार को कुछ बताने का मन नहीं करता, क्योंकि डर है कि बात बढ़ जाएगी। दोस्तों से कहने में झिझक है कि कहीं वे जज न करें। ऐसे में वह एक और रास्ता चुनता है — वह अपने फोन पर टाइप करना शुरू करता है, लेकिन सामने कोई इंसान नहीं है, बल्कि एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। उसे लगता है कि यह सुन लेगा, बिना टोके, बिना जज किए।यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की बदलती आदतों का संकेत है। 2025 के यूथ पल्स सर्वे के मुताबिक भारत में 57 प्रतिशत युवा अपनी भावनाएं AI के साथ साझा कर रहे हैं, अपने दोस्तों या परिवार के बजाय। यह आंकड़ा सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है, जहां इंसानी रिश्तों की जगह धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी लेती दिख रही है।मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में देखें तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। World Health Organisation की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का ट्रीटमेंट गैप 83 प्रतिशत है। यानी 10 में से 8 लोगों को वह मदद ही नहीं मिलती जिसकी उन्हें जरूरत है। ऐसे में जब किसी व्यक्ति को तुरंत सहारा चाहिए, तो उसके पास विकल्प सीमित होते हैं। थेरेपिस्ट तक पहुंचना मुश्किल है, वेटिंग लिस्ट लंबी है, और सामाजिक दबाव अलग।इसी खालीपन को AI भरने की कोशिश कर रहा है। RAND Corporation ने Brown University और Harvard Medical School के साथ मिलकर एक स्टडी की, जो JAMA Network Open में प्रकाशित हुई। इस रिसर्च में 12 से 21 साल के 1,058 युवाओं को शामिल किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे। जो लोग AI से भावनात्मक मदद लेते हैं, उनमें से 93 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें इससे राहत मिली। और 40 प्रतिशत ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने जो बातें AI से कहीं, वे किसी इंसान को कभी नहीं बता पाए।यहां एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है — क्या AI वास्तव में बेहतर है, या यह सिर्फ एक आसान विकल्प है? AI हमें जज नहीं करता, वह हमारी बातों को आगे किसी और तक नहीं पहुंचाता, वह हमेशा उपलब्ध रहता है। लेकिन क्या यह इंसानी रिश्तों की जगह ले सकता है? क्या यह वह गहराई दे सकता है जो एक दोस्त, परिवार या थेरेपिस्ट दे सकता है?AI की सबसे बड़ी सीमा यही है कि वह इंसान नहीं है। वह सहानुभूति को समझ सकता है, लेकिन महसूस नहीं कर सकता। वह जवाब दे सकता है, लेकिन पहल नहीं कर सकता। जब कोई व्यक्ति गहरे संकट में होता है, तब AI उसके पास जाकर दरवाजा नहीं खटखटा सकता, न ही वह फॉलो-अप कॉल कर सकता है। यह एक ऐसी सीमा है जिसे तकनीक अभी पार नहीं कर पाई है।भारत में एक और दिलचस्प ट्रेंड सामने आ रहा है। TeleMANAS हेल्पलाइन, जो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाई जाती है, वहां अब ऐसे कॉल्स आ रहे हैं जहां लोग पहले ChatGPT से बात करते हैं और फिर हेल्पलाइन पर कॉल करते हैं। यानी AI एक शुरुआती कदम बन रहा है, जो लोगों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की हिम्मत देता है। लेकिन अंतिम सहारा अभी भी इंसान ही बनता है।2025 में इंडियन जर्नल ऑफ हेल्थ स्टडीज की एक रिसर्च में कर्नाटक के कॉलेज छात्रों ने बताया कि AI से बात करना उन्हें इसलिए आसान लगता है क्योंकि वह जज नहीं करता और उनकी बात किसी को बताता नहीं। यह बात हमारे समाज की एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है — हम अपने ही लोगों के बीच खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।यह समस्या सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे की भी है। हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां भावनाओं को खुलकर व्यक्त करना कमजोरी माना जाता है। जहां मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना अभी भी एक टैबू है। ऐसे में AI एक सुरक्षित जगह बन जाता है, जहां कोई सवाल नहीं करता, कोई सलाह थोपता नहीं, बस सुनता है।लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हम धीरे-धीरे अपनी भावनाएं सिर्फ AI के साथ साझा करने लगेंगे, तो क्या हम अपने इंसानी रिश्तों को कमजोर नहीं कर देंगे? क्या हम उस कनेक्शन को खो नहीं देंगे जो हमें इंसान बनाता है?AI एक टूल है, एक सहायक माध्यम है, लेकिन यह इंसानों की जगह नहीं ले सकता। यह हमें शुरुआत करने में मदद कर सकता है, लेकिन सफर पूरा करने के लिए हमें इंसानों की जरूरत होगी। हमें ऐसे समाज की जरूरत है जहां लोग एक-दूसरे को सुनें, समझें और बिना जज किए स्वीकार करें।आज की पीढ़ी एक नए मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ टेक्नोलॉजी है जो हर समस्या का त्वरित समाधान देने का दावा करती है, और दूसरी तरफ इंसानी रिश्ते हैं जो समय, धैर्य और समझ की मांग करते हैं। सवाल यह नहीं है कि AI अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि हम इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं।क्या हम AI को एक सहायक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, या हम उसे अपनी भावनात्मक दुनिया का केंद्र बना रहे हैं? क्या हम अपने दोस्तों और परिवार से दूर होते जा रहे हैं, या हम उनके साथ बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए AI का सहारा ले रहे हैं?आखिरकार, यह चुनाव हमारा है। AI हमें सुन सकता है, लेकिन समझने के लिए हमें इंसानों की जरूरत होगी। AI हमें जवाब दे सकता है, लेकिन साथ देने के लिए हमें अपने लोगों के पास ही जाना होगा।एक पूरी पीढ़ी अब यह सीख रही है कि अपनी भावनाएं कैसे व्यक्त करनी हैं। लेकिन असली सवाल अब भी वही है — हमें अपनी भावनाएं किससे साझा करनी चाहिए?

by Dainikshamtak on | 2026-04-23 14:21:21

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