कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में भारत ने वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति करते हुए एआई तैयारियों के मामले में 13वां स्थान हासिल किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आवश्यक कौशल की कमी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। हालिया आकलनों के अनुसार यदि भारत समय रहते एआई से जुड़े कौशल, प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास पर पर्याप्त निवेश नहीं करता है, तो वह लगभग 500 अरब अमेरिकी डॉलर के संभावित आर्थिक अवसर का पूरा लाभ उठाने से वंचित रह सकता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा युवा कार्यबल, तेजी से बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा, मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र जैसी महत्वपूर्ण ताकतें मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्नत एआई, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और जनरेटिव एआई जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित पेशेवरों की मांग उपलब्ध प्रतिभा की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में एआई विनिर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बैंकिंग, परिवहन, रक्षा और सार्वजनिक सेवाओं सहित लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। यदि उद्योग, शैक्षणिक संस्थान और सरकार मिलकर कौशल विकास कार्यक्रमों, अनुसंधान, नवाचार और व्यावहारिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देते हैं, तो भारत वैश्विक एआई अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। केंद्र सरकार भी इंडिया एआई मिशन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नवाचार आधारित पहलों के माध्यम से देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और विकास को प्रोत्साहित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीकी अवसंरचना पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि बड़े पैमाने पर एआई विशेषज्ञों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और डिजिटल कौशल से लैस कार्यबल का निर्माण भी आवश्यक होगा। यदि कौशल अंतर को प्रभावी ढंग से कम किया जाता है, तो भारत न केवल घरेलू उद्योगों की उत्पादकता बढ़ा सकेगा, बल्कि वैश्विक एआई सेवाओं और नवाचार का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है। वहीं यदि यह चुनौती समय पर दूर नहीं की गई, तो संभावित आर्थिक लाभ का एक बड़ा हिस्सा अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की ओर स्थानांतरित हो सकता है।
by Dainikshamtak on | 2026-07-25 15:33:34