भारत में चुनावों को हमेशा लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना गया है। हर कुछ महीनों में देश के किसी न किसी हिस्से में चुनावी रैलियां, प्रचार अभियान, पोस्टर, रोड शो और राजनीतिक बहसें दिखाई देती हैं। लेकिन अब इस पूरे चुनावी सिस्टम को लेकर एक नई बहस तेजी से सामने आ रही है। सवाल यह है कि क्या बार-बार होने वाले चुनाव देश की अर्थव्यवस्था, प्रशासन और विकास की गति पर भारी बोझ बन चुके हैं? इसी बहस के केंद्र में है “वन नेशन वन इलेक्शन” का प्रस्ताव।हाल ही में गांधीनगर में “वन नेशन वन इलेक्शन” पर गठित संयुक्त संसदीय समिति यानी Joint Parliamentary Committee (JPC) ने एक बड़ा दावा किया। समिति के अनुसार देश में बार-बार चुनाव होने की वजह से लगभग 7 लाख करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव पड़ता है। यह आंकड़ा केवल चुनाव आयोग के खर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर देश की पूरी आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ता है।जब लोग चुनावी खर्च की बात करते हैं, तो अक्सर उनका ध्यान केवल वोटिंग मशीनों, सुरक्षा व्यवस्था और चुनावी प्रबंधन तक रहता है। लेकिन JPC का तर्क है कि वास्तविक लागत इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। समिति के अनुसार हर चुनावी चक्र में लगभग 5 करोड़ मजदूर अपने गांव या गृह राज्य लौट जाते हैं ताकि वे मतदान कर सकें। यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसका असर उद्योगों और निर्माण कार्यों पर पड़ता है।जब बड़ी संख्या में मजदूर अस्थायी रूप से काम छोड़कर अपने गृह क्षेत्रों में लौटते हैं, तो फैक्ट्रियां धीमी पड़ जाती हैं, निर्माण परियोजनाएं रुक जाती हैं और स्थानीय उत्पादन प्रभावित होता है। इसका असर राज्य सरकारों की GST वसूली तक पर पड़ता है। यानी चुनाव केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित करने लगते हैं।समिति ने यह भी कहा कि लगातार चुनावों का असर पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ता है। उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड जैसे राज्यों में पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। लेकिन चुनावी रैलियों, सुरक्षा व्यवस्थाओं और मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के चलते पर्यटन सीजन में होटल, स्थानीय व्यापार और परिवहन सेवाएं प्रभावित होती हैं। इससे छोटे व्यापारियों और स्थानीय व्यवसायों को नुकसान उठाना पड़ता है।वन नेशन वन इलेक्शन के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क “मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट” यानी MCC से जुड़ा है। भारत में जब भी चुनाव घोषित होते हैं, तब सरकारों पर कई प्रशासनिक प्रतिबंध लागू हो जाते हैं। नई योजनाओं की घोषणा, बड़े सरकारी टेंडर और कई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अस्थायी रूप से रुक जाते हैं।JPC का मानना है कि चूंकि भारत में किसी न किसी राज्य में लगभग हर समय चुनाव चलते रहते हैं, इसलिए देश लगातार “आंशिक चुनावी मोड” में बना रहता है। इसका असर विकास परियोजनाओं की गति पर पड़ता है। निजी निवेशक भी कई बार चुनावी अनिश्चितता के कारण बड़े निवेश फैसलों को टाल देते हैं। समिति का दावा है कि यदि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो भारत की GDP growth में लगभग 1.6 प्रतिशत तक का अतिरिक्त बढ़ावा मिल सकता है।इस पूरे प्रस्ताव का एक बड़ा प्रशासनिक पहलू भी है। चुनावों के दौरान केवल राजनीतिक दल ही सक्रिय नहीं होते, बल्कि पूरा सरकारी तंत्र चुनावी ड्यूटी में लग जाता है। जिला अधिकारी, राजस्व अधिकारी, शिक्षक और बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया संभालने में जुट जाते हैं। कई बार स्कूलों को मतदान केंद्र में बदल दिया जाता है और प्रशासनिक मशीनरी का सामान्य कामकाज प्रभावित होता है।समर्थकों का कहना है कि यदि चुनाव एक साथ होंगे, तो सरकारी मशीनरी बार-बार चुनावी कार्यों में उलझने के बजाय लंबे समय तक अपने मूल काम यानी प्रशासन और विकास पर ध्यान दे सकेगी। सरकारें भी लगातार “चुनावी मोड” में रहने के बजाय लंबी अवधि की नीतियों पर ज्यादा फोकस कर पाएंगी।वन नेशन वन इलेक्शन के प्रस्ताव के तहत दो चरणों वाला मॉडल सामने रखा गया है। पहले चरण में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएंगे। इसके बाद 100 दिनों के भीतर पंचायत और नगर निकाय चुनाव भी पूरे किए जाएंगे, ताकि पूरा चुनावी चक्र एक साथ सिंक्रोनाइज हो सके।हालांकि यह प्रक्रिया जितनी आसान सुनाई देती है, उतनी है नहीं। इसे लागू करने के लिए संविधान में बड़े संशोधन करने होंगे। संसद को संविधान के अनुच्छेद 83, 172 और 327 जैसे प्रावधानों में बदलाव करना पड़ सकता है। इसके अलावा अतिरिक्त EVM और VVPAT मशीनों की जरूरत पड़ेगी, जिन पर भारी खर्च आएगा।सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि किसी राज्य में सरकार गिर जाती है या “हंग असेंबली” की स्थिति बनती है, तो फिर चुनावी चक्र को दोबारा कैसे संतुलित रखा जाएगा। अगर किसी राज्य में समय से पहले चुनाव कराने पड़ें, तो क्या पूरा देश फिर से असंतुलित चुनावी स्थिति में चला जाएगा? इन सवालों के स्पष्ट जवाब अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं।वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर राजनीतिक मतभेद भी गहरे हैं। समर्थक इसे आर्थिक सुधार और प्रशासनिक दक्षता का बड़ा कदम मानते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि इससे संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। कई विपक्षी दलों का मानना है कि राज्य और केंद्र के मुद्दे अलग होते हैं, इसलिए चुनाव भी अलग-अलग समय पर होना लोकतंत्र के लिए बेहतर है।इसके बावजूद यह स्पष्ट है कि यह बहस अब केवल चुनाव की तारीखों तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल अब भारत के प्रशासनिक मॉडल, आर्थिक प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ चुका है। क्या भारत लगातार चुनावी माहौल से बाहर निकलकर लगातार विकास और गवर्नेंस की दिशा में आगे बढ़ सकता है? आने वाले समय में यही इस बहस का सबसे बड़ा केंद्र रहने वाला है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-27 17:01:58