सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (NCLT) की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताते हुए इसे 'चिंताजनक और निराशाजनक' बताया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने NCLT प्रिंसिपल बेंच, नई दिल्ली की रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्टाफ की कमी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और संविदा कर्मचारियों पर निर्भरता के कारण रिजॉल्यूशन प्लान की मंजूरी में वर्षों की देरी हो रही है। देशभर में 383 आवेदन लंबित हैं जिनमें 48 दिन से 738 दिन तक की देरी है। कुछ मामलों में चार वर्ष बीत चुके हैं। कोर्ट ने रजिस्ट्रार के संविदा पर नियुक्ति पर हैरानी जताई। 'यह अभूतपूर्व है,' बेंच ने कहा। NCLT को आधी अवधि ही काम करना पड़ रहा। सहायक स्टाफ के वेतन अनियमित हैं। 'इन हालात में निर्णय की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?' कोर्ट ने सवाल किया।
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के 330 दिन के सख्त समयसीमा का उल्लंघन हो रहा। NCLT का दोहरा दायित्व—कंपनी कानून और दिवालिया मामलों—से बोझ बढ़ा। औसत रिजॉल्यूशन समय 821 दिन हो गया। संसदीय समिति ने समर्पित IBC ट्रिब्यूनल की सिफारिश की। उच्च न्यायालयों को कंपनी कानून के मामले सौंपने का प्रस्ताव। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी NCLT/NCLAT की आलोचना की। जेट एयरवेज और मांसी ब्रार मामलों में रिकॉर्ड परिवर्तन के आदेश दिए। 'युद्धस्तर' पर सुधार की मांग। रिक्तियां भरने, डेडिकेटेड बेंच बनाने के निर्देश। डिजिटल सुधार, स्टाफिंग और वित्तीय लचीलापन आवश्यक। NCLT में भारी केस लोड, सदस्यों का बहु-बेंच संचालन, अनियमित तबादले प्रमुख समस्या। निवेशक विश्वास घट रहा। IBC के उद्देश्य खतरे में। सुधार से NCLT वैश्विक मानक बनेगा। कॉर्पोरेट विवाद निपटान में दक्षता बढ़ेगी। न्यायपालिका-कार्यपालिका समन्वय जरूरी।
by Dainikshamtak on | 2026-04-30 16:13:04