महाराष्ट्र, एक ऐसा राज्य जो देश में गन्ना उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर आता है, अपनी उपज और कृषि क्षमता के लिए जाना जाता है। लेकिन इन्हीं हरे-भरे गन्ने के खेतों के बीच एक ऐसी सच्चाई भी छुपी है, जो मानवाधिकारों को खुलकर चुनौती देती है। यह कहानी है बीड जिले की उन हजारों महिला मजदूरों की, जिनकी जिंदगी सिर्फ मेहनत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उनकी मजबूरी ने उनके शरीर और स्वास्थ्य तक को प्रभावित कर दिया है।साल 2019 में महाराष्ट्र सरकार की नीलम गोरे समिति ने बीड जिले में एक सर्वे किया। इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले थे। खेतों में काम करने वाली लगभग 82,000 महिला मजदूरों में से 13,861 महिलाओं की हिस्टेरेक्टॉमी हो चुकी थी, यानी उनका गर्भाशय निकाल दिया गया था। यह आंकड़ा सामान्य नहीं है। पूरे देश में हिस्टेरेक्टॉमी का औसत लगभग 3 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन बीड जिले में यह दर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह अंतर अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर ऐसा क्या है जो इन महिलाओं को इतना बड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर रहा है।पहली नजर में यह लग सकता है कि यह महिलाओं का व्यक्तिगत या स्वास्थ्य से जुड़ा निर्णय होगा, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा जटिल और दुखद है। यह निर्णय उनकी इच्छा से नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी से पैदा हुआ है। इस मजबूरी को समझने के लिए ‘कोयता सिस्टम’ की पूरी आर्थिक संरचना को समझना जरूरी है।बीड और आसपास के इलाकों में गन्ने की कटाई के लिए मजदूरों को ‘जोडी’ में काम पर रखा जाता है। यह जोड़ी आमतौर पर पति और पत्नी की होती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कोयता’ कहा जाता है। ठेकेदार इन मजदूरों को काम शुरू करने से पहले ही 50,000 से लेकर 1,00,000 रुपये तक का एडवांस दे देता है। यह एडवांस मजदूरों के लिए एक तरह का कर्ज बन जाता है, जिसे उन्हें पूरे सीजन में काम करके चुकाना होता है।लेकिन इस सिस्टम की असली कठोरता यहीं से शुरू होती है। अगर इस जोड़ी में से कोई एक भी दिन काम पर नहीं आता है, तो उस दिन के लिए 250 से 500 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाता है। अब सोचिए, जब एक महिला मजदूर की रोज की कमाई 100 रुपये से भी कम होती है, तो सिर्फ चार या पांच दिन के पीरियड्स के कारण पूरे हफ्ते की कमाई खत्म हो सकती है। इसका सीधा मतलब है कि उनके ऊपर लिया गया कर्ज और बढ़ता जाता है और आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता रहता है।यही आर्थिक दबाव धीरे-धीरे एक खतरनाक सोच को जन्म देता है। ठेकेदार और कई बार खुद परिवार के लोग भी हिस्टेरेक्टॉमी को एक ‘समाधान’ या ‘निवेश’ के रूप में देखने लगते हैं। उनका मानना होता है कि अगर महिला का मासिक धर्म बंद हो जाएगा, तो वह बिना किसी रुकावट के लगातार काम कर पाएगी। इस सोच के चलते महिलाओं को अपने शरीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खोने के लिए मजबूर किया जाता है।इस मामले में डॉक्टरों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के आरोप भी सामने आए हैं। कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि महिलाओं को ऑपरेशन करवाने के लिए मानसिक और सामाजिक दबाव डाला जाता है। उन्हें यह समझाया जाता है कि यह उनके लिए बेहतर है, जबकि इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी जाती। कई बार यह ऑपरेशन बिना किसी ठोस मेडिकल कारण के करवा दिए जाते हैं, जो पूरी तरह से अनैतिक और खतरनाक है।साल 2025 में राज्यसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट में यह कहा गया कि बीड जिले में कुछ नए नियम लागू किए गए हैं और हिस्टेरेक्टॉमी के मामलों में कमी आई है। सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कुछ नियंत्रण उपाय किए हैं, जिससे इस प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश की जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी उतनी आशाजनक नहीं है।महिला किसान अधिकार मंच, यानी MAKAAM नाम की एक संस्था का कहना है कि अब ये ऑपरेशन बीड जिले से बाहर आसपास के दूसरे जिलों में शिफ्ट हो रहे हैं। इसका कारण यह है कि वहां निगरानी और जांच की प्रक्रिया उतनी सख्त नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि समस्या खत्म नहीं हुई है, बल्कि सिर्फ अपनी जगह बदल रही है।यह स्थिति सिर्फ एक जिले या एक राज्य की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और सिस्टम की विफलता को दर्शाती है। यह दिखाता है कि कैसे आर्थिक दबाव और असंगठित श्रम व्यवस्था महिलाओं को इस हद तक मजबूर कर सकती है कि वे अपने स्वास्थ्य और अधिकारों से समझौता करने लगती हैं।एक इंसान मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पाल सकता है, लेकिन यहां स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि मजबूरी ही पेट काटने का कारण बन रही है। एक तरफ गन्ने की मीठी फसल है, जो बाजार में मिठास का प्रतीक बनती है, और दूसरी तरफ उन महिलाओं की जिंदगी है, जो इस फसल के पीछे अपने शरीर और स्वास्थ्य की कीमत चुका रही हैं।जब तक ‘कोयता सिस्टम’ की इस पूरी संरचना में बदलाव नहीं किया जाता, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। जरूरत है कि मजदूरों को उचित वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जाएं। साथ ही, इस तरह के अनैतिक मेडिकल प्रैक्टिस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिएयह सिर्फ एक आर्थिक या सामाजिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय संकट है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या और भी गहरी हो सकती है। बीड की ये महिलाएं सिर्फ मजदूर नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था की शिकार हैं, जो उनकी मजबूरी को नजरअंदाज कर रही है। और जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, तब तक गन्ने की इस मिठास के पीछे छुपा यह कड़वा सच यूं ही सामने आता रहेगा।
by Dainikshamtak on | 2026-04-29 16:56:26