अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल में प्रति बैरल 126 अमेरिकी डॉलर के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद अब कच्चे तेल की कीमतें लगभग 42 प्रतिशत तक नीचे आ चुकी हैं। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट का प्रमुख कारण मध्य पूर्व में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं का कम होना और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही का सामान्य होना है। वैश्विक ऊर्जा बाजार लंबे समय से क्षेत्रीय तनाव के कारण दबाव में था, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। इस मार्ग से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस का परिवहन होता है। हाल के दिनों में क्षेत्रीय तनाव कम होने और समुद्री परिवहन में सुधार के संकेत मिलने से निवेशकों की चिंता घटी है, जिसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि आने वाले समय में भू-राजनीतिक स्थिति स्थिर बनी रहती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग अपेक्षाकृत कमजोर रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट देखने को मिल सकती है। वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें केवल भू-राजनीतिक घटनाओं से ही प्रभावित नहीं होतीं, बल्कि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर, औद्योगिक गतिविधियों, उत्पादन स्तर, ओपेक प्लस के फैसलों और केंद्रीय बैंकों की आर्थिक नीतियों का भी इन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी को सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि इससे आयात बिल कम होने, मुद्रास्फीति पर दबाव घटने और ईंधन कीमतों में राहत की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होती हैं, जिनमें कर व्यवस्था, विनिमय दर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति शामिल हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो आने वाले सप्ताहों में तेल बाजार में और नरमी देखने को मिल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि मध्य पूर्व की स्थिति, वैश्विक मांग और उत्पादन से जुड़े किसी भी नए घटनाक्रम से कीमतों में फिर बदलाव आ सकता है।
by Dainikshamtak on | 2026-06-26 20:32:30