हाल ही में सांसद और लेखक Shashi Tharoor ने भारत के पर्यटन क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत पर्यटन के मामले में थाईलैंड जैसे देशों से इसलिए पीछे नहीं है क्योंकि भारत के पास आकर्षणों की कमी है, बल्कि इसलिए क्योंकि भारत एक मजबूत और सहज पर्यटन इकोसिस्टम विकसित नहीं कर पाया है। उनके अनुसार समस्या स्मारकों, प्राकृतिक स्थलों या सांस्कृतिक धरोहरों की नहीं, बल्कि उस पूरे अनुभव की है जो किसी पर्यटक को यात्रा के दौरान मिलता है।यदि इस तर्क को मध्य प्रदेश पर लागू किया जाए तो यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है। क्या मध्य प्रदेश की समस्या भी यही है? क्या राज्य के पास पर्यटन स्थलों की कमी है, या फिर चुनौती कहीं और है?पहली नजर में देखा जाए तो मध्य प्रदेश भारत के सबसे समृद्ध पर्यटन राज्यों में से एक है। यहां विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान हैं, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, धार्मिक आस्था के केंद्र हैं और ऐतिहासिक विरासत भी है। उज्जैन का महाकाल लोक, खजुराहो के मंदिर, ओरछा के महल, मांडू की स्थापत्य कला, कान्हा और बांधवगढ़ के टाइगर रिजर्व, भीमबेटका की गुफाएं और सांची का बौद्ध स्तूप राज्य को पर्यटन की दृष्टि से बेहद समृद्ध बनाते हैं।पर्यटन आंकड़े भी प्रभावशाली दिखाई देते हैं। वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश में 13 करोड़ से अधिक पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया। यह संख्या कई राज्यों की कुल आबादी से भी अधिक है। पहली नजर में यह एक बड़ी सफलता प्रतीत होती है। लेकिन जब इन आंकड़ों को गहराई से देखा जाता है तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मध्य प्रदेश केवल पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है, या उनसे एक मजबूत पर्यटन अर्थव्यवस्था भी बना रहा है?पर्यटन उद्योग में केवल आने वाले लोगों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होती। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है कि पर्यटक कितने समय तक रुकता है, कितना खर्च करता है और क्या वह दोबारा लौटना चाहता है। यही वे तत्व हैं जो किसी राज्य को केवल लोकप्रिय पर्यटन स्थल से आगे बढ़ाकर एक मजबूत पर्यटन अर्थव्यवस्था में बदलते हैं।मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती यहीं दिखाई देती है।उज्जैन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महाकाल लोक के निर्माण के बाद उज्जैन में करोड़ों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। लेकिन इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो कुछ घंटों के भीतर दर्शन कर वापस लौट जाते हैं या पास के शहर इंदौर में ठहरते हैं। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में पर्यटक आने के बावजूद स्थानीय अर्थव्यवस्था को वह लाभ नहीं मिल पाता जो लंबी अवधि के प्रवास से प्राप्त हो सकता है।यही स्थिति राज्य के अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी देखी जा सकती है। खजुराहो और कान्हा जैसे स्थान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकर्षक हैं, लेकिन वहां तक पहुंचना आज भी कई विदेशी पर्यटकों के लिए एक चुनौती है। दिल्ली या मुंबई से आने वाले पर्यटकों को अक्सर एक से अधिक उड़ानों, लंबी सड़क यात्राओं या जटिल यात्रा योजनाओं का सामना करना पड़ता है। आधुनिक पर्यटन उद्योग में सुविधा एक महत्वपूर्ण कारक बन चुकी है। यदि किसी पर्यटक को किसी स्थान तक पहुंचने में अत्यधिक समय और प्रयास लगाना पड़े, तो वह अक्सर किसी अधिक सुविधाजनक विकल्प को चुन लेता है।यही वह बिंदु है जिस पर शशि थरूर जोर देते हैं। उनका कहना है कि पर्यटन केवल आकर्षणों का संग्रह नहीं है। यह एक संपूर्ण इकोसिस्टम है जिसमें परिवहन, होटल, स्थानीय अनुभव, स्वच्छता, सुरक्षा, मनोरंजन और निजी निवेश सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।मध्य प्रदेश के संदर्भ में देखा जाए तो राज्य ने पर्यटन प्रचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। “एमपी अजब है, सबसे गजब है” जैसे अभियान देशभर में लोकप्रिय हुए। लेकिन केवल मार्केटिंग से पर्यटन उद्योग की सीमाएं समाप्त नहीं होतीं। पर्यटक को आकर्षित करने के बाद उसे बेहतर अनुभव देना भी उतना ही आवश्यक है।राज्य के सामने एक और चुनौती यह है कि उसके कई प्रमुख पर्यटन स्थल अभी भी “साइट विजिट” मॉडल पर आधारित हैं। लोग आते हैं, स्थल देखते हैं और चले जाते हैं। जबकि वैश्विक स्तर पर सफल पर्यटन मॉडल अनुभव आधारित होते हैं। पर्यटक केवल स्मारक नहीं देखता, बल्कि वह स्थानीय संस्कृति, खानपान, संगीत, उत्सव, वेलनेस गतिविधियों और रात्रिकालीन जीवन का भी अनुभव करना चाहता है।मध्य प्रदेश के पास इस दिशा में अपार संभावनाएं हैं। उदाहरण के लिए, उज्जैन को केवल धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और वेलनेस पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। खजुराहो में सांस्कृतिक उत्सवों और अंतरराष्ट्रीय कला कार्यक्रमों का विस्तार किया जा सकता है। ओरछा और मांडू की विरासत को हेरिटेज होटल मॉडल के माध्यम से नई पहचान दी जा सकती है। कान्हा और बांधवगढ़ में इको-टूरिज्म तथा लक्जरी प्रकृति आधारित अनुभवों को और मजबूत बनाया जा सकता है।निजी क्षेत्र की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। दुनिया के कई सफल पर्यटन स्थलों ने सरकारी नियंत्रण की बजाय निजी निवेश और नवाचार का लाभ उठाया है। सरकार की भूमिका बुनियादी ढांचा, सड़कें, हवाई संपर्क, सुरक्षा और नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने तक सीमित रहती है, जबकि पर्यटकों के लिए अनुभव तैयार करने का कार्य निजी क्षेत्र करता है।मध्य प्रदेश ने हाल के वर्षों में नई पर्यटन नीतियों के माध्यम से इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। निवेश आकर्षित करने, फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने और निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इन पहलों के प्रभाव को व्यापक स्तर पर देखने के लिए अभी समय लगेगा।आखिरकार, मध्य प्रदेश की पर्यटन कहानी केवल संख्या बढ़ाने की कहानी नहीं है। राज्य के पास आकर्षणों की कमी नहीं है और न ही पर्यटकों की। वास्तविक चुनौती यह है कि आने वाले पर्यटक यहां अधिक समय बिताएं, अधिक खर्च करें और अपने अनुभव को दूसरों के साथ साझा करें।यही वह बिंदु है जहां शशि थरूर की बात मध्य प्रदेश पर पूरी तरह लागू होती दिखाई देती है। समस्या यह नहीं कि राज्य के पास देखने के लिए क्या है। समस्या यह है कि क्या राज्य उन लोगों को पर्याप्त कारण दे पा रहा है कि वे यहां रुकें, अनुभव करें और फिर दोबारा लौटकर आएं।यदि मध्य प्रदेश इस प्रश्न का सफल उत्तर खोज लेता है, तो वह केवल भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन राज्यों में से एक नहीं रहेगा, बल्कि देश की सबसे मजबूत पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं में भी शामिल हो सकता है।
by Dainikshamtak on | 2026-06-25 13:37:57