भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने वर्ष 1974 के कच्चातीवू समझौते को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कच्चातीवू द्वीप को श्रीलंका को “उपहार” के रूप में सौंप दिया था। दुबे का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कच्चातीवू द्वीप का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। कच्चातीवू पाक जलडमरूमध्य में स्थित एक छोटा निर्जन द्वीप है, जो भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा निर्धारण समझौते का हिस्सा रहा है। वर्ष 1974 में भारत और श्रीलंका के बीच हुए समुद्री सीमा समझौते के तहत इस द्वीप पर श्रीलंका की संप्रभुता को मान्यता दी गई थी। इसके बाद वर्ष 1976 में दोनों देशों के बीच एक अन्य समुद्री समझौता भी हुआ, जिसमें समुद्री सीमाओं और मछली पकड़ने के अधिकारों से जुड़े प्रावधान शामिल थे। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से इस समझौते की आलोचना करती रही है और उसका कहना है कि इस निर्णय का प्रभाव विशेष रूप से तमिलनाडु के मछुआरों पर पड़ा है, जिन्हें पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में मछली पकड़ने की अनुमति थी। दूसरी ओर कांग्रेस का पक्ष रहा है कि 1974 का समझौता दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के निर्धारण और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस समझौते के तहत भारतीय मछुआरों और श्रद्धालुओं को सेंट एंथनी चर्च में धार्मिक गतिविधियों के लिए जाने की सुविधा से जुड़े प्रावधान भी शामिल थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कच्चातीवू का मुद्दा समय-समय पर राष्ट्रीय राजनीति और विशेष रूप से तमिलनाडु की राजनीति में प्रमुख विषय बनता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस विषय से जुड़े ऐतिहासिक, कानूनी और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को समझना आवश्यक है, क्योंकि यह भारत-श्रीलंका संबंधों और समुद्री सीमा निर्धारण से जुड़ा मामला है। फिलहाल निशिकांत दुबे के बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हालांकि कच्चातीवू से जुड़े ऐतिहासिक निर्णय और उनके प्रभाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की अलग-अलग व्याख्याएं और दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं।
by Dainikshamtak on | 2026-06-26 20:02:46