G7 Summit 2026: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दुनिया की नई सुरक्षा चुनौती बन चुका है

G7 Summit 2026: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दुनिया की नई सुरक्षा चुनौती बन चुका है

एक समय था जब वैश्विक शिखर सम्मेलनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मुख्य रूप से तकनीकी प्रगति, आर्थिक विकास और नवाचार के संदर्भ में देखा जाता था। चर्चा इस बात पर होती थी कि AI उद्योगों को कैसे बदल सकता है, उत्पादकता कैसे बढ़ा सकता है और लोगों के जीवन को कैसे आसान बना सकता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने जिस तरह के युद्ध, साइबर हमले, दुष्प्रचार अभियानों और डिजिटल खतरों का सामना किया है, उसने AI को केवल तकनीक का विषय नहीं रहने दिया। अब यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।इसी बदलते परिदृश्य के बीच फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर गवर्नेंस को वैश्विक सुरक्षा रणनीति के केंद्र में रखा गया। यह एक महत्वपूर्ण संकेत था कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब AI को केवल आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि एक संभावित सुरक्षा चुनौती के रूप में भी देख रही हैं।हाल के वर्षों में डीपफेक तकनीक, AI आधारित साइबर हमले और स्वचालित दुष्प्रचार अभियानों ने सरकारों और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। युद्ध और संघर्ष के दौरान सोशल मीडिया पर फैलाए गए फर्जी वीडियो, नकली भाषण और भ्रामक सूचनाएं न केवल जनता को भ्रमित कर सकती हैं, बल्कि सैन्य अभियानों और कूटनीतिक प्रयासों को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसी कारण G7 में यह स्वीकार किया गया कि AI का प्रभाव अब सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता से जुड़ चुका है।शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “Ensuring a Safe, Rapid and Efficient Rollout of Artificial Intelligence” विषय पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारत की उस सोच को प्रस्तुत किया जिसमें AI को मानव केंद्रित दृष्टिकोण के साथ विकसित करने पर जोर दिया गया। भारत का तर्क था कि AI की वास्तविक सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि मशीनें कितनी शक्तिशाली हो गई हैं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि वे आम लोगों के जीवन को कितना बेहतर और सुरक्षित बनाती हैं।भारत ने इस संदर्भ में “MANAV” यानी मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की अवधारणा को सामने रखा। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि AI तकनीक का विकास केवल व्यावसायिक लाभ या सामरिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित न रहे, बल्कि उसका उपयोग मानव कल्याण और सामाजिक सुरक्षा के लिए भी हो।भारत ने G7 मंच पर AI के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए चार प्रमुख सुझाव प्रस्तुत किए। पहला सुझाव था “सेफ-बाय-डिजाइन” मॉडल। इसका अर्थ है कि AI प्रणालियों में सुरक्षा तंत्र शुरुआत से ही शामिल किए जाएं। अक्सर तकनीकी कंपनियां पहले उत्पाद लॉन्च करती हैं और बाद में सुरक्षा संबंधी समस्याओं को ठीक करने का प्रयास करती हैं। भारत का मानना है कि AI जैसी शक्तिशाली तकनीक के मामले में यह तरीका पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा को विकास प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।दूसरा महत्वपूर्ण प्रस्ताव वैश्विक नियामक ढांचे से संबंधित था। भारत ने सुझाव दिया कि AI के परीक्षण, मूल्यांकन और उपयोग के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समान मानक विकसित किए जाएं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी संस्था या देश नियामक कमजोरियों का फायदा उठाकर खतरनाक AI प्रणालियों का विकास न कर सके। यदि वैश्विक नियमों में एकरूपता होगी, तो AI के दुरुपयोग की संभावनाएं भी कम होंगी।तीसरा प्रस्ताव डीपफेक, साइबर धोखाधड़ी और राज्य प्रायोजित दुष्प्रचार अभियानों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने से जुड़ा था। आज AI की सहायता से ऐसे वीडियो और ऑडियो तैयार किए जा सकते हैं जो वास्तविक और नकली के बीच अंतर करना बेहद कठिन बना देते हैं। चुनावों, सैन्य संघर्षों और सामाजिक आंदोलनों के दौरान ऐसी तकनीकों का दुरुपयोग गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। भारत ने सुझाव दिया कि लोकतांत्रिक देशों को मिलकर इन हाइब्रिड खतरों के खिलाफ एक समन्वित वैश्विक तंत्र विकसित करना चाहिए।चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण सुझाव था ग्लोबल साउथ की भागीदारी सुनिश्चित करना। भारत ने जोर देकर कहा कि AI की सुरक्षा और विकास से जुड़ी चर्चाओं में केवल विकसित देशों का वर्चस्व नहीं होना चाहिए। विकासशील देशों को भी उन्नत तकनीकों, सुरक्षा ढांचों और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तक समान पहुंच मिलनी चाहिए। अन्यथा दुनिया एक नए “डिजिटल विभाजन” का सामना कर सकती है, जहां कुछ देश अत्याधुनिक AI क्षमताओं से लैस होंगे जबकि अन्य देश साइबर खतरों के सामने असुरक्षित बने रहेंगे।G7 चर्चा का एक और महत्वपूर्ण पहलू था साइबर स्पेस को “ग्लोबल पब्लिक गुड” के रूप में देखने का विचार। इसका अर्थ यह है कि डिजिटल दुनिया केवल कुछ कंपनियों या देशों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक साझा संसाधन है जिसकी सुरक्षा और स्थिरता सभी की जिम्मेदारी है। इस दृष्टिकोण के तहत देशों को अपने महत्वपूर्ण सूचना ढांचे, जैसे बिजली ग्रिड, बैंकिंग नेटवर्क, संचार प्रणालियों और सैन्य नेटवर्क की सुरक्षा के लिए सक्षम AI आधारित रक्षा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता होगी।विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आकाश तक सीमित नहीं रहेंगे। साइबर स्पेस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी संघर्ष के प्रमुख क्षेत्र बन सकते हैं। किसी देश की विद्युत व्यवस्था को बाधित करना, बैंकिंग नेटवर्क को ठप करना या सैन्य संचार प्रणाली को निशाना बनाना बिना एक भी गोली चलाए बड़े रणनीतिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है। इसलिए AI आधारित साइबर सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बनती जा रही है।G7 में हुई यह चर्चा ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया तेजी से AI आधारित प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रवेश कर रही है। अमेरिका, चीन, यूरोप और अन्य प्रमुख शक्तियां इस तकनीक में बढ़त हासिल करने के लिए भारी निवेश कर रही हैं। ऐसे माहौल में भारत का प्रयास केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि वह AI के लिए एक संतुलित, सुरक्षित और मानव-केंद्रित वैश्विक ढांचा बनाने की दिशा में भी अपनी भूमिका निभाना चाहता है।अंततः G7 शिखर सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यही था कि AI का भविष्य केवल तकनीकी उत्कृष्टता का प्रश्न नहीं है। यह इस बात का भी प्रश्न है कि मानव समाज इस शक्ति का उपयोग किस प्रकार करता है। यदि सही नियम, सुरक्षा तंत्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित किए गए, तो AI मानव विकास का सबसे बड़ा साधन बन सकता है। लेकिन यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो यही तकनीक भविष्य की सबसे जटिल सुरक्षा चुनौतियों में भी बदल सकती है। AI का युग शुरू हो चुका है, और अब दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस शक्ति को जिम्मेदारी और दूरदर्शिता के साथ कैसे संचालित करती है।

by Dainikshamtak on | 2026-06-19 15:42:58

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