कुछ साल पहले तक ड्रोन का नाम आते ही लोगों के दिमाग में शादी की वीडियोग्राफी, यूट्यूब वीडियो या ऑनलाइन डिलीवरी जैसी चीजें आती थीं। लेकिन आज दुनिया भर के युद्धक्षेत्रों ने यह साबित कर दिया है कि ड्रोन अब केवल कैमरे उड़ाने वाली मशीनें नहीं हैं। वे आधुनिक युद्ध की दिशा और परिणाम तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण हथियारों में बदल चुके हैं। यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक, ड्रोन ने युद्ध की पारंपरिक अवधारणाओं को पूरी तरह बदल दिया है। अब भारत भी इसी बदलाव को देखते हुए अपने रक्षा ढांचे में एक बड़ा परिवर्तन करने जा रहा है।रिपोर्ट्स के अनुसार भारत अपने इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य ड्रोन खरीद की तैयारी कर रहा है। इस प्रस्तावित खरीद का आकार 2 बिलियन डॉलर यानी लगभग 17 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में भारत द्वारा किए गए अधिकांश सामरिक ड्रोन ऑर्डर लगभग 3 हजार करोड़ रुपये के आसपास थे। ऐसे में यह नया कदम केवल एक खरीद नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।सवाल यह है कि आखिर भारत को इतने बड़े पैमाने पर ड्रोन की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है? इसका जवाब पिछले कुछ वर्षों के वैश्विक संघर्षों में छिपा हुआ है। यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन भी महंगे टैंकों, तोपों और सैन्य ठिकानों को नष्ट कर सकते हैं। पश्चिम एशिया में भी ड्रोन तकनीक ने युद्ध की तस्वीर बदल दी है। भारत ने स्वयं पिछले वर्षों में विभिन्न अभियानों और सीमावर्ती क्षेत्रों में मानवरहित प्रणालियों के महत्व को महसूस किया है। यही कारण है कि अब सेना ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर अधिक जोर दे रही है जो कम लागत में अधिक प्रभाव पैदा कर सकें।यह खरीद केवल निगरानी करने वाले ड्रोन तक सीमित नहीं होगी। भारतीय सेना विभिन्न प्रकार की क्षमताओं वाले ड्रोन हासिल करना चाहती है। इनमें इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी ISR ड्रोन शामिल हैं, जिनका उपयोग सीमाओं की निगरानी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाएगा। इसके अलावा लोइटरिंग म्यूनिशन्स या कामिकाज़े ड्रोन भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये ऐसे ड्रोन होते हैं जो लक्ष्य के ऊपर मंडराते हैं और सही अवसर मिलने पर स्वयं को लक्ष्य से टकराकर उसे नष्ट कर देते हैं।इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स ड्रोन पर भी जोर दिया जा रहा है। भारत के कई सीमावर्ती क्षेत्र ऊंचाई और दुर्गम भूगोल के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। ऐसे क्षेत्रों में सैनिकों तक हथियार, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने के लिए भारी पेलोड क्षमता वाले ड्रोन बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त सेना ऐसे सिस्टम भी चाहती है जो इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की परिस्थितियों में काम कर सकें। आधुनिक युद्ध में दुश्मन अक्सर GPS सिग्नल को जाम या स्पूफ करने की कोशिश करता है। इसलिए नए ड्रोन में ऐसी तकनीकें विकसित की जा रही हैं जो GPS के बिना भी अपने मिशन को पूरा कर सकें।इस पूरे कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों को मिल सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया है। आज देश में 600 से अधिक ड्रोन और ड्रोन कंपोनेंट से जुड़ी कंपनियां सक्रिय हैं, जिनमें 100 से अधिक कंपनियां विशेष रूप से सैन्य अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं।इस क्षेत्र में बड़े औद्योगिक समूहों से लेकर उभरते हुए स्टार्टअप्स तक सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और लार्सन एंड टुब्रो जैसी बड़ी कंपनियां पहले से ही रक्षा क्षेत्र में सक्रिय हैं। वहीं आइडियाफोर्ज, न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज, एस्टेरिया एयरोस्पेस और आईजी ड्रोन्स जैसे स्टार्टअप्स नई तकनीकों के विकास में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यदि यह विशाल ऑर्डर घरेलू उद्योग को मिलता है, तो इससे भारत के रक्षा तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र को नई गति मिल सकती है।सरकार भी इस दिशा में कई कदम उठा चुकी है। Innovations for Defence Excellence यानी iDEX जैसी योजनाओं के माध्यम से रक्षा स्टार्टअप्स को वित्तीय सहायता और परीक्षण के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रियाओं को भी पहले की तुलना में अधिक लचीला बनाया गया है ताकि नई कंपनियां तेजी से अपने उत्पाद विकसित कर सकें और सैन्य आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।ड्रोन तकनीक केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। इसके विकास से देश में उच्च तकनीकी विनिर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेंसर तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर विकास जैसे क्षेत्रों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और भारत की तकनीकी क्षमता में भी वृद्धि होगी। यही कारण है कि रक्षा विशेषज्ञ इस खरीद को केवल सैन्य निवेश नहीं, बल्कि एक व्यापक औद्योगिक और तकनीकी परिवर्तन का हिस्सा मान रहे हैं।हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ड्रोन युद्ध की दुनिया तेजी से बदल रही है। आज जो तकनीक अत्याधुनिक मानी जाती है, वह कुछ वर्षों में पुरानी पड़ सकती है। इसलिए केवल ड्रोन खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को लगातार अनुसंधान, नवाचार और उत्पादन क्षमता में निवेश करना होगा ताकि वह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी क्षमताओं को विकसित कर सके।सरल शब्दों में समझें तो भारत अब केवल ड्रोन आयात करने वाला देश नहीं बनना चाहता। देश का लक्ष्य इससे कहीं बड़ा है। भारत ऐसी सैन्य और तकनीकी क्षमता विकसित करना चाहता है जहां भविष्य के युद्धों में उपयोग होने वाले ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियां देश के भीतर ही डिजाइन, विकसित और निर्मित हों। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी बाजार में भी एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है। आधुनिक युद्ध का नया युग शुरू हो चुका है, और भारत अब उसमें दर्शक नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण भागीदार बनने की तैयारी कर रहा है।
by Dainikshamtak on | 2026-06-17 19:48:48