पाकिस्तान बंगाल की खाड़ी में अपनी नई पनडुब्बियों की तैनाती की बात कर रहा है। भारत अपनी रणनीतिक तैयारियों को नए स्तर पर ले जा रहा है। वहीं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं। इन घटनाओं को अलग-अलग देखकर शायद ये सामान्य क्षेत्रीय घटनाएं लगें, लेकिन जब इन्हें एक साथ जोड़ा जाता है तो एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या दक्षिण एशिया एक नए तनावपूर्ण दौर की ओर बढ़ रहा है?हाल ही में पाकिस्तान नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की कि चीन की मदद से तैयार की जा रही नई हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियों को भविष्य में बंगाल की खाड़ी में भी तैनात किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो 1971 के युद्ध के बाद पहली बार पाकिस्तान इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पनडुब्बी उपस्थिति स्थापित करने की कोशिश करेगा।हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस हैं, जिससे वे कई सप्ताह तक बिना सतह पर आए पानी के भीतर रह सकती हैं। इसका मतलब यह है कि उनका पता लगाना अपेक्षाकृत कठिन होगा। हालांकि भारतीय नौसेना अभी भी बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में स्पष्ट बढ़त रखती है, लेकिन पाकिस्तान की ऐसी किसी भी तैनाती से भारत को अपने पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ सकते हैं।इसी दौरान एक और महत्वपूर्ण विकास सामने आया है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की वर्ष 2026 की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पहली बार अपने कुछ परमाणु हथियारों को “ऑपरेशनलली डिप्लॉयड” श्रेणी में रखा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास लगभग 190 परमाणु हथियार हैं, जिनमें से 12 को त्वरित प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए तैनात स्थिति में रखा गया है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव मुख्य रूप से भारत की समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए किया गया है। भारत की परमाणु पनडुब्बियां, जैसे आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात, तभी प्रभावी प्रतिरोधक भूमिका निभा सकती हैं जब उनके हथियार पहले से तैयार अवस्था में हों। यह परिवर्तन भारत की “नो फर्स्ट यूज़” नीति में बदलाव नहीं दर्शाता, बल्कि उसकी प्रतिघात क्षमता को अधिक विश्वसनीय बनाने का प्रयास माना जा रहा है।क्षेत्रीय तनाव को और जटिल बनाती है भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग पूरी तरह से ठप हो चुकी कूटनीतिक प्रक्रिया। 2025 के ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद हुए सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखे हैं। सिंधु जल संधि को लेकर भी तनाव लगातार बना हुआ है। भारत द्वारा पश्चिमी नदियों के जल उपयोग को अधिकतम करने की नीति और पाकिस्तान की बढ़ती चिंताओं ने इस मुद्दे को सुरक्षा और रणनीति से जोड़ दिया है।सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी भी पहले की तुलना में काफी सख्त हो चुकी है। दोनों देशों की सेनाएं उच्च स्तर की सतर्कता बनाए हुए हैं। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे माहौल में किसी भी सीमित घटना या आतंकी हमले के बाद तनाव तेजी से बढ़ सकता है।इन बाहरी चुनौतियों के बीच पाकिस्तान को एक गंभीर आंतरिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में महंगाई, बिजली दरों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक नियंत्रण के मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन लगातार तेज हो रहे हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने कई क्षेत्रों में व्यापक जनसमर्थन हासिल किया है।रावलाकोट और अन्य इलाकों में प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षा बलों के बीच झड़पें भी हुई हैं। आंदोलनकारी आरोप लगाते हैं कि इस क्षेत्र की राजनीतिक व्यवस्था पर इस्लामाबाद का अत्यधिक नियंत्रण है और स्थानीय लोगों की आवाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने और क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है।ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो किसी भी देश के लिए बाहरी सुरक्षा चुनौतियों और आंतरिक अस्थिरता का एक साथ उभरना चिंता का विषय माना जाता है। हालांकि वर्तमान स्थिति को युद्ध की पूर्व सूचना कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन यह भी सच है कि दक्षिण एशिया में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। समुद्री क्षेत्र में नई गतिविधियां, परमाणु प्रतिरोधक क्षमताओं का विकास, कूटनीतिक गतिरोध और आंतरिक राजनीतिक दबाव—ये सभी कारक एक जटिल सुरक्षा वातावरण तैयार कर रहे हैं।फिलहाल भारत और पाकिस्तान दोनों में से कोई भी देश प्रत्यक्ष युद्ध की बात नहीं कर रहा है। दोनों यह भी जानते हैं कि किसी बड़े संघर्ष की कीमत बहुत भारी होगी। फिर भी जब सैन्य तैयारियां बढ़ रही हों, संवाद के रास्ते सीमित हो गए हों और क्षेत्रीय अस्थिरता के नए स्रोत उभर रहे हों, तब एक महत्वपूर्ण प्रश्न अनिवार्य रूप से सामने आता है—क्या यह केवल प्रतिरोधक क्षमता और शक्ति संतुलन का नया दौर है, या दक्षिण एशिया किसी ऐसे अध्याय के करीब पहुंच रहा है जिसकी दिशा अभी स्पष्ट नहीं है?
by Dainikshamtak on | 2026-06-23 14:45:16