भारत में स्टार्टअप कल्चर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। हर दिन कोई नया ऐप, नई सर्विस या नया बिजनेस मॉडल सामने आता है, जो लोगों की जिंदगी को आसान बनाने का दावा करता है। कहीं खाना घर तक पहुंचाया जा रहा है, कहीं मिनटों में किराना डिलीवर हो रहा है, तो कहीं लोग घर बैठे डॉक्टर, ड्राइवर और घरेलू सेवाएं बुक कर पा रहे हैं। लेकिन मई 2026 में दिल्ली से सामने आए एक नए स्टार्टअप ने देशभर में एक अलग तरह की बहस छेड़ दी। इस स्टार्टअप का नाम है “CarryMen” और इसका काम है लोगों के शॉपिंग बैग उठाना।सुनने में यह एक सामान्य सुविधा सेवा लग सकती है, लेकिन जिस तरह इसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, उसके बाद यह केवल एक स्टार्टअप नहीं रहा। यह भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता, गिग इकॉनमी और “डिजिटल नौकर संस्कृति” पर बड़ी बहस का विषय बन गया।दिल्ली के भीड़भाड़ वाले लाजपत नगर मार्केट में शुरू हुई यह सर्विस ग्राहकों को ऑन-डिमांड “शॉपिंग असिस्टेंट” उपलब्ध कराती है। अगर कोई व्यक्ति बाजार में शॉपिंग करने जाता है और भारी बैग उठाने से बचना चाहता है, तो वह CarryMen के जरिए एक असिस्टेंट बुक कर सकता है। यह असिस्टेंट केवल बैग उठाने तक सीमित नहीं रहता। वह लंबी कतारों में खड़ा हो सकता है, फूड स्टॉल से ऑर्डर ला सकता है, रास्ता बनाने में मदद कर सकता है और ग्राहक को सुरक्षित तरीके से पार्किंग या मेट्रो स्टेशन तक छोड़कर भी आता है।कंपनी ने इसे एक “प्रोफेशनल शॉपिंग असिस्टेंस सर्विस” के रूप में पेश किया है। इसके पैकेज 149 रुपये प्रति घंटे से शुरू होते हैं। कुछ प्रमोशनल ऑफर्स में 30 मिनट की सर्विस 79 रुपये तक में भी उपलब्ध बताई गई। यानी अब भारत में इंसानी श्रम भी एक तरह के सब्सक्रिप्शन मॉडल में बदलता दिखाई दे रहा है।विवाद तब शुरू हुआ जब सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई। तस्वीर में एक युवा CarryMen असिस्टेंट एक महिला ग्राहक के पीछे-पीछे चलता दिखाई दे रहा था और उसके हाथों में महिला के सारे शॉपिंग बैग थे। यह दृश्य कई लोगों को असहज लगा। कुछ ही घंटों में इंटरनेट पर बहस छिड़ गई कि क्या यह आधुनिक भारत की “डिजिटल गुलामी” है या सिर्फ एक सामान्य सुविधा सेवा।आलोचकों ने इस स्टार्टअप को भारत में बढ़ती वर्गीय असमानता का प्रतीक बताया। उनका कहना है कि देश का स्टार्टअप इकोसिस्टम अब असली समस्याओं को हल करने के बजाय अमीर लोगों की सुविधाओं पर केंद्रित होता जा रहा है। कुछ लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि पहले ऐप्स खाना डिलीवर करती थीं, अब बैग उठवा रही हैं, और शायद भविष्य में कोई ऐप ट्रैफिक में आपकी तरफ से गुस्सा भी कर दे।कई सामाजिक टिप्पणीकारों ने इसे “कोलोनियल माइंडसेट” यानी औपनिवेशिक मानसिकता का नया रूप बताया। उनका तर्क है कि जब एक युवा व्यक्ति किसी अमीर ग्राहक के पीछे-पीछे केवल बैग उठाने के लिए चलता है, तो यह एक अस्वस्थ सामाजिक शक्ति संतुलन को दर्शाता है। कुछ लोगों ने कहा कि यह दृश्य पुराने समय के नौकर-चाकर वाले समाज की याद दिलाता है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर लोग केवल दूसरों की सुविधा के लिए मौजूद होते थे।आलोचकों का एक बड़ा तर्क यह भी है कि भारत की युवा आबादी को ऐसे कामों में धकेला जा रहा है जिनमें न तो स्किल डेवलपमेंट है और न ही भविष्य की कोई स्थिरता। उनका कहना है कि यदि देश के युवा बैग उठाने, लाइन में खड़े रहने या छोटी-मोटी व्यक्तिगत सेवाओं तक सीमित रह जाएंगे, तो भारत अपनी “डेमोग्राफिक डिविडेंड” यानी युवा शक्ति का सही इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।कुछ अर्थशास्त्रियों और शिक्षाविदों ने भी इस ट्रेंड पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि गिग इकॉनमी में कम स्किल और कम सुरक्षा वाले काम तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे लोगों को तात्कालिक रोजगार तो मिल जाता है, लेकिन लंबे समय में यह रोजगार स्थिर करियर में नहीं बदलता। ऐसे कामों में न सामाजिक सुरक्षा होती है, न स्वास्थ्य लाभ और न ही नौकरी की स्थिरता।हालांकि दूसरी तरफ CarryMen के समर्थक भी हैं। उनका कहना है कि भारत में पहले से ही रेलवे स्टेशनों, मंडियों और बाजारों में कुली या सामान ढोने वाले मजदूर मौजूद रहे हैं। CarryMen सिर्फ उसी मॉडल को डिजिटल और संगठित तरीके से पेश कर रहा है। समर्थकों का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से यह काम कर रहा है और इसके बदले उसे आय मिल रही है, तो इसे गलत क्यों माना जाए।कई लोगों ने यह भी कहा कि यह सेवा बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के साथ शॉपिंग करने वाले परिवारों के लिए काफी उपयोगी हो सकती है। दिल्ली जैसे भीड़भाड़ वाले बाजारों में भारी बैग उठाकर घूमना कई लोगों के लिए मुश्किल होता है। ऐसे में अगर कोई मदद उपलब्ध हो रही है, तो इसे केवल वर्गीय शोषण के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।कुछ उद्यमियों और गिग इकॉनमी समर्थकों ने यह भी कहा कि हर व्यक्ति के पास फूड डिलीवरी या कैब ड्राइविंग जैसी नौकरियों के लिए जरूरी साधन नहीं होते। किसी के पास बाइक नहीं होती, किसी के पास ज्यादा पढ़ाई नहीं होती। ऐसे में कम प्रवेश बाधा वाले काम कई लोगों के लिए तुरंत रोजगार का साधन बन सकते हैं।लेकिन इस बहस का असली केंद्र सिर्फ बैग उठाना नहीं है। असली सवाल यह है कि भारत की शहरी अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है। क्या टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप्स लोगों को ज्यादा सक्षम बना रहे हैं, या फिर समाज को ऐसे वर्गों में बांट रहे हैं जहां एक वर्ग केवल सुविधाएं खरीदता है और दूसरा वर्ग केवल सेवा देता है?दिल्ली में इससे पहले भी इस तरह के मुद्दे विवाद का कारण बन चुके हैं। कुछ समय पहले दिल्ली पुलिस को अपने सुरक्षा कर्मियों को लेकर विशेष निर्देश जारी करने पड़े थे, क्योंकि कई वीवीआईपी अपने सुरक्षा गार्ड्स से शॉपिंग बैग उठवाते, छाता पकड़वाते और निजी काम करवाते पाए गए थे। तब पुलिस विभाग ने साफ कहा था कि सुरक्षा कर्मियों का काम घरेलू सहायक बनना नहीं है।CarryMen विवाद ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्टार्टअप संस्कृति के जरिए हो रहा है। जहां पहले किसी को “नौकर” कहा जाता था, अब उसे “गिग वर्कर” या “शॉपिंग असिस्टेंट” कहा जा रहा है।सरल शब्दों में समझें तो यह विवाद सिर्फ एक स्टार्टअप का नहीं है। यह उस बदलते शहरी भारत की तस्वीर है जहां सुविधा, तकनीक और आर्थिक असमानता एक-दूसरे से टकरा रही हैं। कुछ लोग इसे रोजगार और सुविधा का नया मॉडल मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे आधुनिक दौर का “डिजिटल नौकर कल्चर” बता रहे हैं। आने वाले समय में यह बहस और गहरी हो सकती है, क्योंकि भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम अब केवल टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार और सोच को भी बदलने लगा है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-28 18:45:14