भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि एआई मानव निर्णय और विवेक का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और एआई विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्षमता बढ़ाने, डेटा विश्लेषण करने और प्रक्रियाओं को तेज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय लेने के लिए मानवीय समझ, अनुभव, नैतिकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता बनी रहती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय व्यवस्था सहित कई क्षेत्रों में तकनीकी उपकरणों का उपयोग उपयोगी हो सकता है, लेकिन केवल एल्गोरिदम या मशीन आधारित विश्लेषण के आधार पर जटिल मानवीय परिस्थितियों का पूरी तरह आकलन नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानून, न्याय और प्रशासन से जुड़े मामलों में मानवीय दृष्टिकोण की विशेष भूमिका होती है, जिसे कोई भी तकनीक पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त, उद्योग, अनुसंधान और सार्वजनिक प्रशासन सहित अनेक क्षेत्रों में तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही यह बहस भी तेज हुई है कि एआई भविष्य में कितनी हद तक मानवीय कार्यों का स्थान ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई बड़े पैमाने पर जानकारी का विश्लेषण करने और निर्णय प्रक्रिया में सहायता प्रदान करने में सक्षम है, लेकिन उसमें मानवीय भावनाएं, सामाजिक संदर्भ और नैतिक विवेक जैसी विशेषताएं नहीं होतीं। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब विश्वभर में एआई के उपयोग, नियमन और उसके संभावित प्रभावों पर चर्चा हो रही है। उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीक को मानव क्षमताओं को सशक्त बनाने के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि मानव निर्णय प्रक्रिया के पूर्ण विकल्प के रूप में। विश्लेषकों के अनुसार यह विचार न्यायिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में तकनीक के जिम्मेदार उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है और भविष्य की नीतियों के लिए भी प्रासंगिक माना जा सकता है।
by Dainikshamtak on | 2026-06-08 15:16:34