अगर एक साल के लिए भारत की पूरी तेल सप्लाई रुक जाए, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप पर लंबी लाइनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था हिल सकती है। यह कोई काल्पनिक डर नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव की वास्तविकता से जुड़ा हुआ खतरा है। खास तौर पर Strait of Hormuz, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए लाइफलाइन जैसा है। भारत का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल, 50 प्रतिशत गैस और 90 प्रतिशत एलपीजी इसी रास्ते से होकर आता है। ऐसे में अगर यहां किसी तरह का अवरोध आता है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा।भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या यह है कि भारत के पास अपनी पर्याप्त शिपिंग क्षमता नहीं है। इसका मतलब यह है कि सिर्फ तेल खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षित तरीके से देश तक पहुंचाने की क्षमता भी जरूरी है। अगर वैश्विक संकट के समय शिपिंग कंपनियां अपने जहाज वापस बुला लें या प्राथमिकता बदल दें, तो भारत के पास विकल्प बहुत सीमित रह जाते हैं।वैश्विक शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री पर नजर डालें तो स्थिति और भी गंभीर दिखती है। China, South Korea और Japan मिलकर दुनिया के लगभग 95 प्रतिशत जहाज निर्माण पर नियंत्रण रखते हैं। इसके मुकाबले भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 1 प्रतिशत है। यह आंकड़ा सिर्फ एक आर्थिक कमी नहीं दर्शाता, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी को भी उजागर करता है। क्योंकि जहाज निर्माण क्षमता का सीधा संबंध किसी देश की व्यापारिक स्वतंत्रता और आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण से होता है।यही कारण है कि भारत अब इस क्षेत्र में तेजी से बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है। इस दिशा में एक बड़ा कदम HD Hyundai द्वारा तमिलनाडु के Thoothukudi में प्रस्तावित 4 बिलियन डॉलर के विशाल शिपयार्ड के रूप में सामने आया है। यह निवेश भारत के निजी क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा शिपबिल्डिंग निवेश माना जा रहा है। इस परियोजना की खास बात यह है कि यह अकेली सुविधा भारत की वर्तमान कुल उत्पादन क्षमता के बराबर जहाज बनाने का लक्ष्य रखती है। अगर यह लक्ष्य पूरा होता है, तो भारत की वैश्विक हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।सरकार भी इस बदलाव को गति देने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही है। शिपबिल्डिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए 45 से 47 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है। यह कदम न केवल निवेशकों को आकर्षित करने के लिए है, बल्कि घरेलू उत्पादन को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए भी जरूरी है। लंबे समय तक भारत में शिपबिल्डिंग की लागत अन्य देशों की तुलना में अधिक रही है, जिसके कारण यह उद्योग पीछे रह गया। लेकिन नई नीतियों और निवेश के साथ अब यह स्थिति बदलने की उम्मीद है।यह पूरा घटनाक्रम केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी कूटनीतिक रणनीति भी काम कर रही है। हाल ही में Narendra Modi और Yoon Suk Yeol के बीच हुई मुलाकात में 21 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाना है। लक्ष्य यह रखा गया है कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 27 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 50 बिलियन डॉलर तक पहुंचाया जाए।भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ते संबंध केवल व्यापार और रणनीति तक सीमित नहीं हैं। सांस्कृतिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच एक मजबूत जुड़ाव बन चुका है। BTS जैसे के-पॉप बैंड और Squid Game जैसी लोकप्रिय वेब सीरीज ने भारतीय युवाओं के बीच कोरियाई संस्कृति को काफी लोकप्रिय बना दिया है। इस सांस्कृतिक प्रभाव ने दोनों देशों के बीच सहयोग के लिए एक सकारात्मक माहौल तैयार किया है, जिसे अब आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदला जा रहा है।लेकिन इन सभी सकारात्मक संकेतों के बावजूद, भारत के सामने चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को खड़ा करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इसमें भारी निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता, कुशल श्रम और मजबूत सप्लाई चेन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी बहुत तीव्र है। चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों ने दशकों तक इस क्षेत्र में निवेश किया है और आज वे तकनीक और उत्पादन दोनों में काफी आगे हैं।भारत के लिए यह सफर आसान नहीं होगा, लेकिन यह जरूरी जरूर है। क्योंकि जब तक किसी देश के पास अपनी शिपिंग और शिपबिल्डिंग क्षमता नहीं होती, तब तक वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा, तीनों ही इस क्षमता से जुड़े हुए हैं।आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से तय करना होगा। सिर्फ आयात पर निर्भर रहना अब सुरक्षित विकल्प नहीं है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में आत्मनिर्भरता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन सकती है।1 प्रतिशत से दुनिया के टॉप 5 शिपबिल्डिंग देशों में पहुंचने का लक्ष्य निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी है। लेकिन हर बड़े बदलाव की शुरुआत एक छोटे कदम से ही होती है। HD Hyundai का यह निवेश और सरकार की नीतिगत पहल उस पहले मजबूत कदम की तरह है, जो भारत को एक नई दिशा में ले जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस मौके को कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से भुना पाता है।
by Dainikshamtak on | 2026-04-27 15:01:59