सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों से पहले राजनीतिक दलों द्वारा वादा किए जाने वाले "अल्पबुद्धि फ्रीबीज" के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) मार्च 2026 में सुनने का फैसला किया है। मुख्य न्यायाधीश बीआर सूर्यकांत ने इसे "सर्वोच्च महत्व का मुद्दा और गंभीर लोकहित का प्रश्न" करार दिया। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने तंज कसते हुए कहा, "सूर्य और चंद्रमा के अलावा कुछ बाकी नहीं बचा।" याचिका चुनाव आयोग से मांग करती है कि ऐसी पार्टियों का प्रतीक जब्त कर पंजीकरण रद्द किया जाए।
2022 में दायर यह PIL राजनीतिक दलों द्वारा लोकलुभावन वादों को वोटरों को रिश्वत के समान बताती है। याचिका में कहा गया कि सार्वजनिक धन से फ्रीबीज का वादा लोकतांत्रिक मूल्यों को नष्ट करता है। चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता भंग होती है। याचिकाकर्ता ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 में संशोधन की मांग की जिसमें स्पष्ट प्रावधान हो कि "चुनाव से पहले सार्वजनिक कोष से अल्पबुद्धि फ्रीबीज का वादा/वितरण नहीं।"
CJI ने तीन जजों की बेंच से सुनवाई का आदेश दिया। केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी। 2022 में तत्कालीन CJI एनवी रमणा ने इसे "गंभीर मुद्दा" कहा था जब "फ्रीबी बजट नियमित बजट से अधिक" हो जाता है। याचिका में कहा गया कि यह प्रथा वोटरों को प्रभावित करने वाली भ्रष्टाचार है। लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा।
राजनीतिक दलों पर असर पड़ेगा। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले महत्वपूर्ण। AAP, DMK, तमिलनाडु, केरल मॉडल पर बहस तेज। BJP नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका। विपक्ष इसे "नीतिगत निर्णयों" पर हस्तक्षेप बता सकता। सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनावी घोषणा-पत्रों को नियंत्रित कर सकता। वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित। लोकतंत्र की गुणवत्ता पर बहस छिड़ेगी।
by Dainikshamtak on | 2026-02-08 18:09:50