राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के शीर्ष पद सरसंघचालक को लेकर संगठन की वैचारिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस पद को किसी विशेष जाति से नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने कहा कि सरसंघचालक न तो ब्राह्मण हो सकता है, न क्षत्रिय और न ही किसी अन्य जाति के आधार पर इस पद का निर्धारण किया जाता है, बल्कि इस पद के लिए केवल हिंदू होना ही मानदंड है। मोहन भागवत का यह बयान संघ की आंतरिक संरचना और उसकी विचारधारा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें संगठन स्वयं को जाति आधारित पहचान से ऊपर बताता रहा है। उनके अनुसार, संघ में पद और दायित्व किसी सामाजिक वर्ग या जातिगत पहचान से नहीं, बल्कि व्यक्ति की वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठन के मूल सिद्धांतों से जुड़े होते हैं। उन्होंने यह संकेत दिया कि संघ हिंदू समाज को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखता है, न कि विभिन्न जातियों में बंटे समूह के रूप में। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश में जाति, पहचान और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। मोहन भागवत का यह वक्तव्य संघ की उस सोच को रेखांकित करता है, जिसमें वह हिंदू पहचान को समग्र और एकीकृत रूप में प्रस्तुत करता है। हालांकि, इस बयान पर अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों की प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, क्योंकि जाति से जुड़े मुद्दे भारतीय समाज में संवेदनशील माने जाते हैं। संघ के समर्थक इसे जाति-भेद से ऊपर उठने का संदेश बता सकते हैं, जबकि आलोचक इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से देख सकते हैं। फिलहाल, इस टिप्पणी को संघ की वैचारिक स्थिति और संगठनात्मक सिद्धांतों के स्पष्टीकरण के रूप में देखा जा रहा है, जिसने एक बार फिर सामाजिक पहचान और संगठनात्मक संरचना को लेकर बहस को तेज कर दिया है।
by Dainikshamtak on | 2026-02-08 16:49:38