राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में अलीगढ़ में एक सभा को संबोधित करते हुए जाति व्यवस्था को 'पंडितों द्वारा बनाई गई गलती' करार दिया और इसे समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जाति व्यवस्था ईश्वर की नहीं, बल्कि कुछ पंडितों की रचना है, जो समाज में भेदभाव और विभाजन का कारण बनी है। भागवत ने 'एक मंदिर, एक कुआँ, एक श्मशान' की अवधारणा को अपनाने की अपील की, जिससे समाज में समानता और एकता को बढ़ावा मिल सके।
भागवत ने यह भी कहा कि सामाजिक असमानता भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक भूल है जिसे स्वीकार कर सुधारना चाहिए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि 'पंडित' शब्द का उपयोग विद्वानों के लिए किया गया है, न कि विशेष रूप से ब्राह्मणों के लिए। उनके इस बयान पर कुछ धार्मिक नेताओं और संगठनों ने प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने भागवत के दृष्टिकोण पर असहमति जताई है और इसे हिंदू परंपराओं के खिलाफ बताया है।
भागवत के इस बयान को सामाजिक समरसता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, हालांकि कुछ लोग इसे राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। इससे पहले भी भागवत ने जाति व्यवस्था को समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया है, लेकिन इस बार का उनका बयान अधिक स्पष्ट और निर्णायक माना जा रहा है।
by Dainik Shamtak on | 2025-05-06 01:18:14