भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाए सुस्ती के बादल, विकास दर पर संकट का साया?

भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाए सुस्ती के बादल, विकास दर पर संकट का साया?

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर हाल ही में कुछ ऐसे संकेत सामने आए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही है। वित्तीय सेवा फर्म नोवामा (Novama) की एक रिपोर्ट ने यह साफ़ किया है कि कई प्रमुख आर्थिक संकेतक अब उतने मजबूत नहीं रहे, जितने पिछले कुछ वर्षों में दिखाई दे रहे थे। हाई-फ़्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स, जो किसी भी देश की आर्थिक स्थिति का त्वरित आकलन करते हैं, पहले डबल-डिजिट ग्रोथ दिखा रहे थे, लेकिन अब वे सिंगल-डिजिट पर सिमट गए हैं। यह स्थिति कुछ हद तक 2018–2019 जैसी लग रही है, जब महामारी के आने से पहले ही अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुजर रही थी।

यदि इन संकेतकों को करीब से देखा जाए तो तस्वीर और साफ़ होती है। यात्री वाहन बिक्री, जो कभी 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी, अब केवल 2 प्रतिशत पर टिक गई है। रियल एस्टेट क्षेत्र, जिसने हाल तक 28 प्रतिशत की तेज़ वृद्धि दर्ज की थी, अब महज 4 प्रतिशत पर सिमट गया है। देश की शीर्ष 500 सूचीबद्ध कंपनियों में वेतन वृद्धि की दर भी 12 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत रह गई है, जिसका सीधा असर उपभोक्ता खर्च और मांग पर पड़ता है। आठ प्रमुख कोर सेक्टर जैसे बिजली, कोयला, इस्पात और सीमेंट की वृद्धि दर 8 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह बैंक क्रेडिट की वृद्धि 16 प्रतिशत से गिरकर 9 प्रतिशत रह गई है और जीएसटी संग्रह की वृद्धि दर 11 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत पर पहुँच गई है। ये आँकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन फिलहाल धीमी चाल से चल रहा है।

यह सुस्ती केवल घरेलू कारणों का परिणाम नहीं है बल्कि वैश्विक परिस्थितियाँ भी इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं। विशेष रूप से अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध ने वैश्विक मांग को कमजोर कर दिया है और इसका सीधा असर भारत के निर्यात और सकल घरेलू उत्पाद पर देखने को मिल रहा है। चीन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण औद्योगिक कंपोनेंट्स के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, जिससे भारतीय उद्योगों की सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर, अमेरिका ने वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों पर शुल्क लगाए हैं, जो भारत के लिए एक अवसर हो सकता है यदि वह अमेरिका के साथ लाभकारी व्यापार समझौता कर पाए।

आर्थिक सुस्ती का असर कई स्तरों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत से नीचे गिर सकती है। इसके साथ ही सरकार का कर राजस्व भी कम हो जाएगा। निजी क्षेत्र की पूंजीगत व्यय योजनाएँ टल सकती हैं, जिससे नए रोज़गार सृजन की गति धीमी हो जाएगी और युवाओं के लिए अवसर सीमित हो जाएंगे। आम आदमी की क्रय शक्ति में कमी का खतरा भी बढ़ सकता है। इस परिस्थिति में के-शेप्ड रिकवरी की संभावना भी जताई जा रही है, जिसमें संगठित और औपचारिक क्षेत्र तो आगे बढ़ते रहेंगे लेकिन ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र पिछड़ते जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के पास इस चुनौती से निपटने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खर्च बढ़ाने की ज़रूरत है, जैसे मनरेगा जैसी योजनाओं के माध्यम से। साथ ही बुनियादी ढाँचे पर निवेश बढ़ाने और भारतीय रिज़र्व बैंक से ब्याज दरों में कटौती करवाने की संभावनाएँ भी हैं। एमएसएमई और निर्यातकों को लक्षित मदद देना भी इस समय बेहद महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। दीर्घकालिक स्तर पर सरकार की रणनीति ‘De-risk, Diversify और Defend’ पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य चीनी निवेश पर कड़ी निगरानी रखना और ‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाना है।

नोवामा की रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। हालाँकि, भारत के पास अवसर भी मौजूद हैं। यदि सरकार समय रहते सही कदम उठाती है तो इस सुस्ती को नियंत्रित किया जा सकता है और विकास की रफ्तार दोबारा तेज़ हो सकती है। लेकिन यदि नीतिगत फैसले देर से लिए गए, तो यह मंदी लंबे समय तक अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित कर सकती है।

by Dainikshamtak on | 2025-08-26 14:43:25

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