भारत के पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) ने युद्ध के प्रभावों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि युद्ध की लागत केवल रुपये या रक्षा बजट तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसकी एक बड़ी सामाजिक कीमत भी होती है। उन्होंने कहा कि जब किसी युद्ध की चर्चा होती है, तो अक्सर उसका आर्थिक पक्ष, सैन्य खर्च और बजट पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रमुखता दी जाती है। हालांकि, युद्ध का सबसे गहरा प्रभाव समाज पर पड़ता है, जिसे केवल वित्तीय आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। जनरल नरवणे ने कहा कि युद्ध के कारण बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और लाखों लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित होता है। विस्थापन (Displacement), शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा, आजीविका का संकट तथा सामाजिक अस्थिरता युद्ध की ऐसी मानवीय लागतें हैं, जिनकी भरपाई वर्षों तक नहीं हो पाती। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि किसी भी संघर्ष का मूल्यांकन केवल हथियारों, सैन्य अभियानों या आर्थिक व्यय के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसके मानवीय और सामाजिक परिणामों को भी समान महत्व देना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धों में नागरिक आबादी पर पड़ने वाला प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक होता है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी संघर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात करती हैं। जनरल नरवणे की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी युद्ध का वास्तविक प्रभाव केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर अर्थव्यवस्था, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों तक दिखाई देता है। उनका यह बयान युद्ध के मानवीय पक्ष पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
by Dainikshamtak on | 2026-07-19 16:17:40