अरविंद पनगढ़िया बोले, ₹100 प्रति डॉलर को मनोवैज्ञानिक बाधा नहीं बनाना चाहिए

अरविंद पनगढ़िया बोले, ₹100 प्रति डॉलर को मनोवैज्ञानिक बाधा नहीं बनाना चाहिए

Arvind Panagariya ने कहा है कि रुपये को कृत्रिम रूप से स्थिर रखने के बजाय उसे बाज़ार परिस्थितियों के अनुसार समायोजित होने देना चाहिए, और डॉलर के मुकाबले ₹100 के स्तर को “मनोवैज्ञानिक बाधा” की तरह नहीं देखना चाहिए। उनका कहना था कि ₹100 केवल एक संख्या है, जो ₹99 या ₹101 से मूल रूप से अलग नहीं है, चाहे तेल झटका अस्थायी हो या लंबे समय तक बना रहे।

विश्लेषकों के अनुसार, विनिमय दर केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि निवेशकों, आयातकों और आम जनता की धारणा से भी जुड़ी होती है। कई बार सरकारें और केंद्रीय बैंक कुछ प्रतीकात्मक स्तरों को लेकर बाजार में अत्यधिक अस्थिरता रोकने की कोशिश करते हैं। हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि अत्यधिक हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार और मौद्रिक नीति पर दबाव बढ़ सकता है।

Arvind Panagariya लंबे समय से मुक्त बाज़ार आधारित आर्थिक दृष्टिकोण और संरचनात्मक सुधारों के समर्थक माने जाते हैं। उनका बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा कीमतें, पश्चिम एशिया की स्थिति और डॉलर की मजबूती उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को प्रभावित कर रही हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतें और डॉलर-रुपया विनिमय दर अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। रुपये में गिरावट से आयात महंगे हो सकते हैं, जिससे ईंधन लागत और मुद्रास्फीति पर असर पड़ सकता है। वहीं कमजोर रुपया निर्यात प्रतिस्पर्धा को कुछ हद तक समर्थन भी दे सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि केंद्रीय बैंक आमतौर पर विनिमय दर को किसी निश्चित स्तर पर स्थिर रखने के बजाय अत्यधिक उतार-चढ़ाव नियंत्रित करने पर ध्यान देते हैं। यदि बाजार किसी विशेष संख्या को “संकट संकेत” की तरह देखने लगे, तो उससे निवेशक व्यवहार और पूंजी प्रवाह प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि मुद्रा अवमूल्यन का असर केवल आर्थिक सिद्धांत तक सीमित नहीं रहता। आयात-निर्भर क्षेत्रों, विदेशी शिक्षा, विदेश यात्रा और बाहरी ऋण लागत पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए विनिमय दर नीति में आर्थिक स्थिरता और बाज़ार संकेतों के बीच संतुलन आवश्यक माना जाता है।

सोशल मीडिया और आर्थिक हलकों में Arvind Panagariya की टिप्पणी को लेकर व्यापक चर्चा देखने को मिली। कुछ लोगों ने इसे व्यावहारिक आर्थिक दृष्टिकोण बताया, जबकि कई विशेषज्ञों ने मुद्रास्फीति और आयात लागत के जोखिमों पर भी ध्यान दिलाया।

फिलहाल रुपये की दिशा, वैश्विक तेल कीमतें और डॉलर की मजबूती भारतीय आर्थिक नीति चर्चा के प्रमुख विषय बने हुए हैं।

by Dainikshamtak on | 2026-05-22 14:32:53

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