पिछले कुछ वर्षों में भारत ने दुनिया के सामने खुद को एक तेजी से उभरती हुई रिन्यूएबल एनर्जी पावर के रूप में स्थापित किया है। सोलर और विंड एनर्जी के क्षेत्र में देश ने रिकॉर्ड स्तर पर निवेश और विस्तार किया है। लेकिन अब भारत केवल इन्हीं स्रोतों पर निर्भर रहने की रणनीति नहीं बना रहा। देश अब न्यूक्लियर एनर्जी यानी परमाणु ऊर्जा को भी भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा आधार बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में सरकारी बिजली कंपनी एनटीपीसी ने अपने पहले स्टैंडअलोन न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट की तैयारी शुरू कर दी है।रिपोर्ट्स के अनुसार एनटीपीसी जल्द ही डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी यानी डीएई को अपनी पहली फिजिबिलिटी रिपोर्ट सौंपने वाली है। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अब तक भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र मुख्य रूप से न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी एनपीसीआईएल के नियंत्रण में रहा है। लेकिन अब सरकार निजी और अन्य सार्वजनिक कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही है ताकि देश की ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा सके।एनटीपीसी का लक्ष्य है कि वर्ष 2032 तक कम से कम 2 गीगावॉट न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल की जाए। हालांकि कंपनी की दीर्घकालिक योजना इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। भविष्य में एनटीपीसी 14 राज्यों में लगभग 30 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता विकसित करना चाहती है। यह लक्ष्य भारत की ऊर्जा नीति में आने वाले बड़े बदलाव का संकेत देता है, जहां कोयला आधारित बिजली उत्पादन के साथ-साथ स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा स्रोतों पर भी जोर दिया जा रहा है।इस योजना का सबसे प्रमुख प्रोजेक्ट बिहार के बांका जिले में प्रस्तावित है। यहां 700 मेगावॉट क्षमता वाले दो न्यूक्लियर यूनिट्स लगाने की तैयारी की जा रही है। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में इसकी क्षमता बढ़ाकर 2.8 गीगावॉट तक की जा सकती है। बिहार जैसे राज्य में इतने बड़े परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट की संभावना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे क्षेत्र में रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिल सकता है।एनटीपीसी फिलहाल राजस्थान के माही बांसवाड़ा प्रोजेक्ट में भी सक्रिय रूप से काम कर रही है। यह परियोजना एनपीसीआईएल के साथ संयुक्त उद्यम “अश्विनी” के तहत विकसित की जा रही है। इस प्रोजेक्ट में कुल चार 700 मेगावॉट यूनिट्स स्थापित की जानी हैं। मई 2026 में एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड यानी एईआरबी ने इस साइट पर पहले दो यूनिट्स के लिए खुदाई कार्य को मंजूरी भी दे दी है। यह इस बात का संकेत है कि भारत में न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को अब तेज गति से आगे बढ़ाया जा रहा है।हालांकि परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स की तुलना में कहीं ज्यादा महंगी और जटिल होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केवल 1 गीगावॉट न्यूक्लियर पावर प्लांट स्थापित करने में 15 से 20 हजार करोड़ रुपये तक का निवेश लग सकता है। इसके अलावा किसी भी परियोजना को योजना से लेकर संचालन तक पहुंचाने में कम से कम तीन साल या उससे अधिक का समय लग सकता है। सुरक्षा मानकों, पर्यावरणीय मंजूरी और तकनीकी परीक्षणों के कारण यह प्रक्रिया और भी लंबी हो जाती है।फिर भी भारत न्यूक्लियर एनर्जी पर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है? इसका सबसे बड़ा कारण है ऊर्जा सुरक्षा। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग लगातार बढ़ने वाली है। केवल सोलर और विंड ऊर्जा पर निर्भर रहना आसान नहीं है क्योंकि ये मौसम पर आधारित स्रोत हैं। जब सूरज नहीं निकलेगा या हवा कम चलेगी तब बिजली उत्पादन भी प्रभावित होगा। ऐसे में न्यूक्लियर एनर्जी एक स्थिर और लगातार बिजली देने वाला विकल्प बनकर सामने आती है।इसके अलावा भारत कार्बन उत्सर्जन कम करने के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों की दिशा में भी काम कर रहा है। कोयले से बनने वाली बिजली पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती मानी जाती है। न्यूक्लियर पावर कम कार्बन उत्सर्जन के साथ बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन करने में सक्षम है। यही कारण है कि दुनिया के कई विकसित देश भी अपने ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा की भूमिका बढ़ा रहे हैं।भारत सरकार का बड़ा लक्ष्य वर्ष 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल करना है। यह लक्ष्य केवल बिजली उत्पादन नहीं बल्कि भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की रणनीति का हिस्सा है। सरकार ने इसके लिए नीतिगत बदलावों पर भी काम शुरू कर दिया है। 2025 में लाया गया SHANTI Bill इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य न्यूक्लियर सेक्टर में कॉर्पोरेट भागीदारी को आसान बनाना है।हालांकि न्यूक्लियर एनर्जी को लेकर चिंताएं भी कम नहीं हैं। सुरक्षा, रेडियोएक्टिव वेस्ट मैनेजमेंट और संभावित दुर्घटनाओं को लेकर दुनिया भर में बहस होती रही है। फुकुशिमा और चेरनोबिल जैसी घटनाओं ने परमाणु ऊर्जा के खतरों को भी सामने रखा है। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी होगा कि वह तकनीकी सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।इसके बावजूद भारत की वर्तमान ऊर्जा रणनीति साफ दिखाई दे रही है। देश अब केवल एक स्रोत पर निर्भर रहने की बजाय मल्टी-लेयर्ड एनर्जी मॉडल की ओर बढ़ रहा है। सोलर, विंड, हाइड्रो और न्यूक्लियर — सभी को मिलाकर भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की तैयारी की जा रही है। यह रणनीति केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने की नहीं बल्कि ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने की भी है।सरल शब्दों में समझें तो भारत अब केवल “क्लीन एनर्जी” की बात नहीं कर रहा, बल्कि “एनर्जी सिक्योरिटी” की दिशा में एक बड़ा ढांचा तैयार कर रहा है। आने वाले वर्षों में न्यूक्लियर एनर्जी इस ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकती है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-19 20:43:32