पश्चिम बंगाल की राजनीति में मई 2026 एक बड़े बदलाव के रूप में दर्ज हो चुका है। 9 मई 2026 को सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसके साथ ही राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता संभाली। लेकिन राजनीतिक बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा। सरकार बनने के शुरुआती दो हफ्तों में ही कई ऐसे फैसले लिए गए, जिन्होंने यह संकेत दे दिया कि नई सरकार केवल प्रशासन चलाने नहीं बल्कि पूरे गवर्नेंस मॉडल को बदलने की कोशिश कर रही है।नई सरकार के शुरुआती फैसलों में सबसे अधिक चर्चा राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े निर्णयों की हुई। मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद सुवेंदु अधिकारी सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर लंबित बॉर्डर फेंसिंग कार्य को पूरा करने के लिए बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स यानी बीएसएफ को जमीन हस्तांतरण की मंजूरी दे दी। लंबे समय से सीमा पर कई हिस्सों में फेंसिंग अधूरी थी, जिसे लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेद बने हुए थे। नई सरकार ने इस प्रक्रिया को तेज करते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।इसके साथ ही राज्य में लंबे समय से लंबित जनगणना प्रक्रिया को भी हरी झंडी दे दी गई। राज्य सरकार का कहना है कि कई नीतियों, विशेषकर महिलाओं के लिए आरक्षण और सामाजिक योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों की आवश्यकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह कदम भविष्य की राजनीतिक और प्रशासनिक रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।कानून व्यवस्था के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पश्चिम बंगाल सरकार ने भारतीय न्याय संहिता यानी Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) को पूरी तरह लागू करने का फैसला किया है। यह नया कानून औपनिवेशिक दौर के पुराने आपराधिक कानूनों की जगह ले रहा है। सरकार का दावा है कि इससे राज्य की कानून व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर की नई कानूनी संरचना के अनुरूप बनाया जा सकेगा।नई सरकार के सबसे चर्चित फैसलों में से एक सामाजिक कल्याण योजनाओं और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव भी है। राज्य सरकार ने जून 2026 से धर्म आधारित वित्तीय सहायता योजनाओं को बंद करने का फैसला लिया है। ये योजनाएं पहले सूचना एवं संस्कृति विभाग तथा अल्पसंख्यक मामलों के विभाग के तहत चलाई जाती थीं। सरकार का तर्क है कि राज्य की योजनाएं धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के आधार पर होनी चाहिए।इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की पुरानी ओबीसी सूची को भी समाप्त कर दिया गया है। यह फैसला कलकत्ता हाई कोर्ट के एक पूर्व निर्णय के अनुरूप बताया जा रहा है। सरकार ने घोषणा की है कि अब एक नया विशेषज्ञ पैनल बनाया जाएगा जो आरक्षण पात्रता की समीक्षा करेगा और नई सिफारिशें देगा। इस कदम को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है क्योंकि इसका असर राज्य की सामाजिक और चुनावी राजनीति दोनों पर पड़ सकता है।महिलाओं के लिए भी नई सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। ममता बनर्जी सरकार की लोकप्रिय योजना “लक्ष्मी भंडार” की जगह अब “अन्नपूर्णा योजना” शुरू की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी, जो पहले मिलने वाली राशि से दोगुनी है। सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और उन्हें अधिक सामाजिक सुरक्षा मिलेगी।स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पश्चिम बंगाल सरकार ने अब केंद्र की आयुष्मान भारत योजना को आधिकारिक रूप से लागू करने का फैसला किया है। इसके तहत गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा कवर मिलेगा। पहले राज्य सरकार इस योजना को लेकर केंद्र से अलग रुख रखती थी, लेकिन अब नई सरकार इसे सीधे लागू कर रही है। इससे लाखों परिवारों को निजी और सरकारी अस्पतालों में इलाज की सुविधा मिलने की उम्मीद है।महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की घोषणा भी नई सरकार के बड़े फैसलों में शामिल है। इसके अलावा राज्य कर्मचारियों, शिक्षकों और अन्य सरकारी कर्मियों के लिए 7वें वेतन आयोग के गठन को भी मंजूरी दी गई है। यह फैसला लंबे समय से लंबित मांगों में से एक था और इससे लाखों कर्मचारियों को आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है।नई सरकार का विशेष ध्यान उत्तर बंगाल क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने उत्तर बंगाल के लिए अलग प्रशासनिक सक्रियता का संकेत देते हुए सिलिगुड़ी स्थित “उत्तर कन्या” सचिवालय से नियमित जनसुनवाई की व्यवस्था शुरू करने की बात कही है। इसके तहत मंत्री सीधे लोगों की शिकायतें सुनेंगे। इसके अलावा उत्तर बंगाल में AIIMS, IIT और IIM जैसे बड़े संस्थानों की स्थापना के प्रस्तावों पर भी प्रारंभिक काम शुरू किया गया है।चाय बागान मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए भी सरकार ने कदम उठाने की बात कही है। राज्य सरकार ने असम के मॉडल का अध्ययन करने और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में श्रमिकों की स्थिति सुधारने के निर्देश दिए हैं। उत्तर बंगाल की अर्थव्यवस्था में चाय उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए यह फैसला राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में यह केवल सरकार बदलने का मामला नहीं है। नई सरकार राज्य की प्रशासनिक प्राथमिकताओं, कल्याण मॉडल, केंद्र-राज्य संबंधों और कानून व्यवस्था की दिशा को पूरी तरह बदलने की कोशिश कर रही है। जहां एक ओर भाजपा सरकार इन फैसलों को “गुड गवर्नेंस” और “राष्ट्रीय एकीकरण” की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा और वैचारिक बदलाव के रूप में देख रहा है।फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य की राजनीति और प्रशासन दोनों एक नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये नीतिगत बदलाव जमीन पर कितना असर डालते हैं और राज्य की जनता इन्हें किस नजर से देखती है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-23 15:47:58