10 मई 2026 को तेलंगाना के सिकंदराबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए एक ऐसी अपील की, जिसने लोगों का ध्यान सिर्फ राजनीति या विदेश नीति की तरफ नहीं बल्कि सीधे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और खर्चों की तरफ खींच लिया। प्रधानमंत्री ने लोगों से कहा कि अगले एक साल तक सोना खरीदने से बचें, विदेशी यात्राएं टालें, पेट्रोल और डीजल की बचत करें, लोकल प्रोडक्ट्स को प्राथमिकता दें और खाने के तेल की खपत कम करें। यह कोई सरकारी आदेश या कानूनी प्रतिबंध नहीं था, बल्कि एक तरह का “राष्ट्रीय कर्तव्य” संदेश था। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सरकार को ऐसी अपील करने की जरूरत क्यों पड़ी?इस पूरी अपील की जड़ में है वेस्ट एशिया यानी मध्य पूर्व में बढ़ता संकट। पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र में लगातार तनाव बढ़ा है, जिसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार ग्लोबल क्रूड ऑयल प्राइस 126 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुके हैं। भारत जैसे देश के लिए यह बेहद चिंता की बात है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यानी दुनिया में तेल महंगा होगा तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये की कीमत, पेट्रोल-डीजल के दाम और आम आदमी के खर्चों पर पड़ेगा।प्रधानमंत्री मोदी की पहली और सबसे चर्चित अपील थी कि लोग अगले एक साल तक सोना खरीदने से बचें। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इम्पोर्टर्स में से एक है। हर साल लाखों करोड़ रुपये का सोना विदेशों से खरीदा जाता है। शादी-ब्याह, त्योहार और निवेश के तौर पर भारतीय परिवार बड़ी मात्रा में सोना खरीदते हैं। लेकिन जब देश पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ता है, तब गोल्ड इम्पोर्ट देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त बोझ डालता है। यही वजह है कि पीएम ने लोगों से अपील की कि फिलहाल गोल्ड खरीदारी को टालकर देश की अर्थव्यवस्था को सहयोग दें।दूसरी बड़ी अपील थी वर्क फ्रॉम होम और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को फिर से बढ़ावा देने की। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने बड़े स्तर पर वर्क फ्रॉम होम मॉडल देखा था। अब सरकार चाहती है कि कंपनियां जरूरत के हिसाब से इसे फिर अपनाएं ताकि रोजाना का ईंधन खर्च कम हो सके। लाखों लोग हर दिन ऑफिस आने-जाने में पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल करते हैं। यदि इसका कुछ हिस्सा भी कम हो जाए तो देश के ईंधन आयात बिल पर असर पड़ सकता hai।प्रधानमंत्री ने लोगों से कारपूलिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और छोटी दूरी के लिए साइकिल इस्तेमाल करने की भी अपील की। यह सिर्फ ईंधन बचाने की बात नहीं है बल्कि बड़े शहरों में बढ़ते ट्रैफिक और प्रदूषण को कम करने का भी तरीका माना जा रहा है। दिल्ली, मुंबई, पुणे, भोपाल और बेंगलुरु जैसे शहर पहले से ही ट्रैफिक और एयर पॉल्यूशन की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में ईंधन की बचत और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।पीएम मोदी की एक और महत्वपूर्ण अपील थी कि लोग विदेशी छुट्टियों और डेस्टिनेशन वेडिंग्स को कुछ समय के लिए टाल दें। पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में शादी करने और विदेशी पर्यटन का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। इससे बड़ी मात्रा में पैसा देश के बाहर जाता है। सरकार चाहती है कि यह खर्च भारत के अंदर ही रहे ताकि घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। इसी सोच के साथ “Wed in India” और “Vocal for Local” जैसे संदेशों को फिर से आगे बढ़ाया गया। इसका उद्देश्य सिर्फ आर्थिक राष्ट्रवाद नहीं बल्कि घरेलू उद्योगों, पर्यटन और स्थानीय व्यापार को मजबूती देना भी है।प्रधानमंत्री ने खाने के तेल की खपत कम करने की भी बात कही। भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल जैसी चीजें बड़ी मात्रा में विदेशों से आती हैं। अगर वैश्विक बाजार में संकट बढ़ता है तो इनके दाम भी तेजी से बढ़ सकते हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि लोग जरूरत के हिसाब से सीमित उपयोग करें ताकि आयात का दबाव कम किया जा सके।किसानों के लिए प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की। इसका कारण भी आर्थिक है। भारत बड़ी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भर रहता है। अंतरराष्ट्रीय संकट बढ़ने पर इनकी कीमतें भी बढ़ जाती हैं। यदि प्राकृतिक खेती और जैविक विकल्पों को बढ़ावा मिलता है तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे किसानों की लागत भी कम होगी और पर्यावरण को भी फायदा पहुंचेगा।असल में सरकार की सबसे बड़ी चिंता “करंट अकाउंट डेफिसिट” यानी CAD को लेकर है। जब कोई देश आयात ज्यादा और निर्यात कम करता है तो विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है। तेल की बढ़ती कीमतें भारत के आयात बिल को और भारी बना सकती हैं। इसका असर रुपये की कीमत पर भी पड़ता है। रुपया कमजोर होगा तो विदेशों से आने वाली चीजें और महंगी हो जाएंगी। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है।यह पहली बार नहीं है जब किसी संकट के समय देशवासियों से इस तरह की अपील की गई हो। कोरोना महामारी के दौरान भी लोगों से कई तरह के सहयोग की अपील की गई थी। लेकिन इस बार मामला स्वास्थ्य संकट का नहीं बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा का है। सरकार शायद यह संदेश देना चाहती है कि आने वाले समय में वैश्विक अस्थिरता का असर हर देश पर पड़ेगा और भारत को भी इसके लिए तैयार रहना होगा।इस पूरी अपील को कुछ लोग “देशभक्ति वाली मितव्ययिता” यानी patriotic austerity का नाम दे रहे हैं। सरकार सीधे तौर पर लोगों से कह रही है कि यदि वे थोड़ी बचत और संयम दिखाएं तो देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह भी सच है कि इन अपीलों का असर तभी होगा जब आम लोग इन्हें गंभीरता से लें और सरकार भी आर्थिक मोर्चे पर संतुलन बनाए रखे।फिलहाल इतना साफ है कि वेस्ट एशिया संकट अब सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर भारत के पेट्रोल पंप से लेकर किराना बाजार तक और शादी-ब्याह से लेकर ऑफिस कल्चर तक दिखाई देने लगा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की ये अपीलें कितनी असरदार साबित होती हैं और क्या भारत इस वैश्विक आर्थिक दबाव को बिना बड़े झटकों के संभाल पाता है।
by Dainikshamtak on | 2026-05-14 18:31:12