सात्विक ने कहा, भारत अभी पूरी तरह खेल संस्कृति वाला देश नहीं बना

सात्विक ने कहा, भारत अभी पूरी तरह खेल संस्कृति वाला देश नहीं बना

भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी Satwiksairaj Rankireddy ने देश में खेलों को मिलने वाली प्राथमिकता और खिलाड़ियों की सार्वजनिक पहचान को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत अभी पूरी तरह “स्पोर्टिंग नेशन” नहीं बना है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और इंस्टाग्राम मॉडल्स को कई बार खिलाड़ियों से अधिक महत्व दिया जाता है। उनके बयान के बाद खेल संस्कृति, मीडिया प्राथमिकताओं और खिलाड़ियों की पहचान को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

Satwiksairaj Rankireddy भारत के प्रमुख बैडमिंटन खिलाड़ियों में शामिल हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। हाल के वर्षों में भारतीय बैडमिंटन ने वैश्विक स्तर पर मजबूत प्रदर्शन किया है, जिसमें पुरुष और महिला खिलाड़ियों ने बड़े टूर्नामेंटों में पदक और खिताब जीते हैं। इसके बावजूद कई खिलाड़ी लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को अपेक्षित लोकप्रियता और व्यावसायिक समर्थन नहीं मिलता।

अपने बयान में Satwiksairaj Rankireddy ने कथित तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धियों की तुलना में सोशल मीडिया आधारित लोकप्रियता को अधिक महत्व दिया जाता है। खेल विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी केवल बैडमिंटन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कई गैर-क्रिकेट खेलों में सक्रिय खिलाड़ियों की व्यापक भावना को दर्शाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में खेलों की लोकप्रियता लंबे समय से असंतुलित रही है, जहां क्रिकेट को अत्यधिक व्यावसायिक और मीडिया समर्थन मिलता है जबकि अन्य खेल अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों और दृश्यता के साथ आगे बढ़ते हैं। हालांकि पिछले एक दशक में ओलंपिक, बैडमिंटन, कुश्ती, एथलेटिक्स और शूटिंग जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की सफलता के बाद स्थिति में कुछ बदलाव जरूर आया है।

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने लोकप्रियता और सार्वजनिक पहचान के पैमानों को भी बदल दिया है। अब खिलाड़ियों की दृश्यता केवल खेल प्रदर्शन पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि डिजिटल उपस्थिति, ब्रांड वैल्यू और ऑनलाइन एंगेजमेंट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खेल उपलब्धियों और मनोरंजन आधारित लोकप्रियता के बीच तुलना बढ़ी है।

हालांकि कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भारत में खेल संस्कृति धीरे-धीरे विकसित हो रही है। स्कूल स्तर पर खेलों को बढ़ावा, सरकारी योजनाएं, निजी अकादमियां और अंतरराष्ट्रीय सफलताएं भविष्य में व्यापक खेल भागीदारी को मजबूत कर सकती हैं। लेकिन वे मानते हैं कि खिलाड़ियों को स्थायी आर्थिक सुरक्षा, मीडिया कवरेज और सामाजिक सम्मान देने की दिशा में अभी काफी काम बाकी है।

Satwiksairaj Rankireddy का बयान सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है, जहां कई लोग उनके विचारों का समर्थन कर रहे हैं जबकि कुछ इसे बदलते डिजिटल दौर की वास्तविकता बता रहे हैं।

by Dainikshamtak on | 2026-05-08 17:14:52

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