संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार मसौदे पर भारत की आपत्ति, पारदर्शी और सर्वसम्मति आधारित प्रक्रिया की मांग

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार मसौदे पर भारत की आपत्ति, पारदर्शी और सर्वसम्मति आधारित प्रक्रिया की मांग

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार से संबंधित मसौदा प्रस्ताव पर गंभीर आपत्तियां जताते हुए कहा है कि इसमें कई महत्वपूर्ण वार्ता बिंदुओं पर पर्याप्त स्पष्टता का अभाव है। नई दिल्ली ने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पारदर्शी, समावेशी और सर्वसम्मति आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। भारतीय प्रतिनिधियों का मानना है कि सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एजेंडे में शामिल रहा है और इसे जल्दबाजी में या अस्पष्ट प्रावधानों के आधार पर आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। भारत ने कहा कि किसी भी सुधार प्रक्रिया का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधिक, प्रभावी और समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होना चाहिए। वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को दर्शाती है, जबकि आज की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हो चुके हैं। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार और विकासशील देशों के बेहतर प्रतिनिधित्व की वकालत करता रहा है। भारतीय पक्ष का तर्क है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि अंतर-सरकारी वार्ताओं के दौरान सभी सदस्य देशों की चिंताओं और सुझावों को समान महत्व दिया जाना आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार वैश्विक कूटनीति के सबसे जटिल और लंबे समय से लंबित मुद्दों में से एक है। परिषद के स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या, वीटो अधिकार, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया जैसे विषयों पर सदस्य देशों के बीच विभिन्न मत मौजूद हैं। भारत का कहना है कि किसी भी मसौदा प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से पहले इन सभी मुद्दों पर स्पष्टता और व्यापक सहमति सुनिश्चित की जानी चाहिए। नई दिल्ली ने दोहराया कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को मजबूत करने के लिए वास्तविक और सार्थक सुधार आवश्यक हैं। भारत का यह रुख उसकी उस दीर्घकालिक नीति के अनुरूप है जिसमें वह अधिक लोकतांत्रिक, प्रतिनिधिक और जवाबदेह वैश्विक संस्थाओं की आवश्यकता पर जोर देता रहा है।

by Dainikshamtak on | 2026-06-16 17:03:54

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