डेटा का नया युग: क्या भारत दुनिया का अगला AI और डेटा हब बनने जा रहा है

डेटा का नया युग: क्या भारत दुनिया का अगला AI और डेटा हब बनने जा रहा है

21वीं सदी में एक कहावत तेजी से लोकप्रिय हुई है—“Data is the new oil.” कभी तेल और प्राकृतिक संसाधन किसी देश की ताकत का सबसे बड़ा आधार माने जाते थे, लेकिन आज के डिजिटल दौर में डेटा उतना ही महत्वपूर्ण हो चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, सोशल मीडिया, डिजिटल पेमेंट्स और इंटरनेट की पूरी दुनिया डेटा पर टिकी हुई है। जिस देश के पास डेटा को स्टोर करने, प्रोसेस करने और सुरक्षित रखने की क्षमता होगी, वही भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे मजबूत स्थिति में होगा। भारत अब इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाता दिखाई दे रहा है।हाल ही में केंद्र सरकार ने Union Budget FY27 में एक ऐसा फैसला लिया है जिसने वैश्विक टेक उद्योग का ध्यान भारत की ओर खींच लिया है। सरकार ने डेटा सेंटर सेक्टर के लिए मिलने वाले टैक्स लाभों को वर्ष 2047 तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह केवल एक कर छूट नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य भारत को दुनिया के प्रमुख डेटा और AI इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्रों में बदलना है।सरकार के इस फैसले का असर लगभग तुरंत दिखाई दिया। ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख डेटा सेंटर कंपनी AirTrunk ने भारत में लगभग 30 बिलियन डॉलर यानी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना की घोषणा कर दी। यह निवेश केवल एक कॉर्पोरेट विस्तार नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि वैश्विक कंपनियां अब भारत को भविष्य के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देख रही हैं।AirTrunk का लक्ष्य वर्ष 2030 तक भारत में 5 गीगावॉट AI-ready डेटा सेंटर क्षमता विकसित करना है। यह आंकड़ा अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान में भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता लगभग 1.5 गीगावॉट के आसपास मानी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो AirTrunk अकेले ही भारत की मौजूदा डिजिटल क्षमता को कई गुना बढ़ाने की योजना बना रहा है।इस विस्तार का सबसे बड़ा केंद्र महाराष्ट्र का रायगढ़ क्षेत्र हो सकता है। यहां लगभग 3 गीगावॉट क्षमता वाला एक विशाल डेटा सेंटर कैंपस विकसित करने की योजना है। अनुमान है कि इस परियोजना में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। यदि यह परियोजना पूरी तरह साकार होती है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े AI और क्लाउड कंप्यूटिंग परिसरों में से एक हो सकती है। इसके अलावा मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में भी सैकड़ों मेगावॉट की अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।हालांकि यह कहानी केवल बड़े-बड़े भवनों और सर्वरों की नहीं है। इसके पीछे एक व्यापक आर्थिक और रणनीतिक सोच भी छिपी हुई है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां जैसे Google, Amazon Web Services (AWS) और Microsoft लगातार अपने क्लाउड और AI नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं। इन कंपनियों को ऐसे देशों की आवश्यकता है जहां बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर स्थापित किए जा सकें, पर्याप्त बिजली उपलब्ध हो, इंटरनेट कनेक्टिविटी मजबूत हो और नीतिगत स्थिरता भी मौजूद हो। भारत अब इन सभी आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।सरकार की रणनीति भी काफी स्पष्ट दिखाई देती है। भारत अब केवल डिजिटल सेवाओं का उपभोक्ता बनकर नहीं रहना चाहता। लक्ष्य यह है कि देश डेटा को स्टोर भी करे, उसे प्रोसेस भी करे और AI मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए आवश्यक कंप्यूटिंग क्षमता भी उपलब्ध कराए। सरल शब्दों में कहें तो भारत अब केवल डिजिटल बाजार नहीं बनना चाहता, बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का वैश्विक केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है।लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती बिजली की है। विशेषज्ञों के अनुसार 5 गीगावॉट डेटा सेंटर क्षमता को लगातार संचालित करने के लिए उतनी बिजली की आवश्यकता हो सकती है जितनी एक मध्यम आकार का भारतीय राज्य उपभोग करता है। AI आधारित सर्वर और बड़े कंप्यूटिंग क्लस्टर चौबीसों घंटे काम करते हैं, जिसके कारण ऊर्जा की मांग बेहद अधिक होती है।यही कारण है कि डेटा सेंटर विस्तार के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा, आधुनिक पावर ग्रिड और हाई-स्पीड फाइबर नेटवर्क पर भी समानांतर रूप से काम किया जा रहा है। कई राज्य सरकारें सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को डेटा सेंटर परिसरों से जोड़ने की योजना बना रही हैं ताकि बढ़ती ऊर्जा मांग को टिकाऊ तरीके से पूरा किया जा सके।इस निवेश का आर्थिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है। डेटा सेंटर केवल सर्वर रखने की जगह नहीं होते, बल्कि इनके आसपास एक पूरा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है। इसमें निर्माण क्षेत्र, बिजली उत्पादन, कूलिंग टेक्नोलॉजी, फाइबर नेटवर्क, साइबर सुरक्षा, चिप पैकेजिंग और हजारों तकनीकी नौकरियां शामिल होती हैं। इसलिए डेटा सेंटर सेक्टर का विस्तार रोजगार और निवेश दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।इसके साथ ही यह भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत कर सकता है। जिस तरह पिछले दशकों में भारत ने वैश्विक IT सेवाओं का केंद्र बनकर अपनी पहचान बनाई थी, उसी तरह आने वाले वर्षों में डेटा और AI इंफ्रास्ट्रक्चर का केंद्र बनना देश की नई पहचान बन सकता है। AI तकनीक के तेजी से विस्तार के दौर में डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग क्षमता किसी भी देश की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रही है।आज दुनिया के अधिकांश बड़े डेटा सेंटर अमेरिका और यूरोप में स्थित हैं। लेकिन एशिया में डिजिटल सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। भारत अपनी भौगोलिक स्थिति, विशाल डिजिटल बाजार, तकनीकी प्रतिभा और नीतिगत समर्थन के कारण इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है।सरल शब्दों में समझें तो भारत अब केवल सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट करने वाला देश नहीं रहना चाहता। देश का लक्ष्य अब कहीं बड़ा है। भारत चाहता है कि भविष्य में दुनिया के AI मॉडल्स, क्लाउड प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा भारतीय डेटा सेंटरों के माध्यम से संचालित हो। अगर यह रणनीति सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत केवल डिजिटल इंडिया नहीं होगा, बल्कि वैश्विक डेटा और AI अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख शक्ति केंद्र बन सकता है।

by Dainikshamtak on | 2026-06-11 15:18:36

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